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साहस ही समृद्धि को इंगित करता हैं

          note No. 105                    पैसा पाने के लिए इंसान में बहुत सी बड़ी बातों और विलक्षण गुणों का होना अत्यंत आवश्यक हैं और इसके लिए बहुत मेहनत लगती हैं...सिर्फ़ बड़ा बिजनेस बना लेने से ही कोई धनवान नहीं बन जाता हैं, अपितु व्यक्ति समृद्ध तभी माना जा सकता हैं, जबकि वो बिजनेस को अच्छे इरादों से और दातव्यता की भावना से संचालित करता हैं...व्यवसाय में व्यक्ति तभी सफल होगा जब उसका, व्यवसाय की समूची गुणवत्ता पर विशेष ध्यान रहता हो...उसे व्यवसाय की जड़ों की समझ हो।...महान उद्यमी बड़े – बड़े उपक्रमों के रचना संसार को निर्मित, विकसित और उत्पादित करता हैं...उनमें जोखिमों को वहन करने का अदम्य साहस होता हैं...साहस ही सही समृद्धि को इंगित करता हैं...और समृद्ध इंसान की जड़ें बहुत गहराई में बहुत मजबूती से जमी होती हैं, जिससे उसका आधार कभी नहीं डिगमिगाता चूँकि आधार शक्तिशाली होता हैं तो उसपर कितना ही भार लाद तो वो सुगमता से वहन कर ही लेता हैं !                     ...

"मेरे पिता आर्थिक मामलों में कभी आगे नहीं बढ़ पाए... उन्होंने अपनी तमाम उम्र अभावों में रहकर ही गुजार दी थी"

                      Note No. 104         शायद मुझे अच्छे से तो याद नहीं... हां मगर फिर भी मुझे बहुत कुछ याद हैं । ... मसला ये था कि मेरी मां मेरे पिताजी से उनके आर्थिक अभावों और उनकी नाकामियों को लेकर अक्सर शिकायतें करती रहती थी । ... और ये स्थिति मेरे जन्म के पूर्व और अधिक बलवती होगी... इसमें कोई संदेह नहीं !                मुझे याद हैं... मां, पिताजी से अधिकांश मौकों पर आर्थिक तंगी को लेकर झगड़ती रहती थी और मेरे पिताजी हमेशा की तरह मां को झूठी सांत्वना दिया करते थे कि सबकुछ ठीक हो जायेगा...वो कहते...कोई न कोई रास्ता या समाधान निकल ही जाएगा...। मगर मेरी मां को शायद ये अच्छे से विदित था कि मेरे पिता के माध्यम से कभी कोई हल नहीं निकलने वाला था ।  Campus Men's CESTER (N) Running Shoes https://amzn.eu/d/5G9qL2x                 मेरे पिता कभी पैसों के मामले में प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाए...उन्होंने अपनी तमाम उम्र आर्थिक अभावों...

सचमुच बेहद तकलीफ होती हैं, जब हमारे ख़्वाब सहसा टूटकर बिखर जाते हैं 😔

                   Note No. ‘103’         किसे पता होता हैं कि उनके जीवन में एक दिन ऐसा भी आएगा, जो उनके सारे सपनों को चकनाचूर करके आगे निकल जाएगा। सचमुच जब किसी के सुंदर ख्वाब अचानक से टूट जाते हैं, तो बेहद तकलीफ़ होती हैं...लोग बेतहाशा निराशाओं से घिर जाते हैं । जब ज़िंदगी उनकी खुशनुमा इच्छाओं और आशाओं के मुताबिक नहीं चल पाती हैं...और ऐसे हालात उन्हें गमगीन कर देते हैं ।                किसी भी शख्स के लिए, जो सपनों को शिद्दत से जीता हैं, उसके लिए उसके ख्वाब बेहद अनमोल होते हैं ।...और उन ख्वाबों में किसी का कितना कुछ मूल्यवान विद्यमान रहता हैं तथा ऐसे में वही ख़्वाब, जो किसी की बेहतरीन जिंदगी का आवश्यक हिस्सा बन सकते थे, जब सहसा बड़ी बेरहमी से टूटकर बिखर जाते हैं, तो असहनीय पीड़ा होती हैं तथा उसका जो मलाल होता हैं वो अत्यंत कष्टकारी होता हैं...!!😔                                     ...

वहां का पूरा माहौल अत्यंत शोकपूर्ण हो चुका था l Hindi Heart Touching Line

                                        Note No. ‘102’                  ये लगभग तब की बात हैं, जब शायद मेरे दूध के दांत गिर रहे होंगे...और उस वक्त मैं अपने मामा के घर था ।...ये एक हादसा था, जो किसी के लिए भी अत्यंत कष्ट कारक और दर्दनाक था ।                उस दिन मैं अपनी मां और नानी के साथ खेतों पर था । वहां नजदीक ही एक कम गहरा, छोटा और फिसलन भरा कुआं था, जिसमें लोग अक्सर उतरकर आसानी से पानी भर लिया करते थे । उस दिन मेरी मां और नानी के साथ कुछ महिलाएं खेतों में काम कर रही थी। और उसी दिन गांव के दो लड़के, जो लगभग मेरे जितने ही थे, उस कुए के गिर्द खेलने आ गए थे और उन्हें देखकर मैं भी उनके साथ खेलने के लालच में उनके पास आने लगा। मगर मेरे वहां पहुंचने के पहले ही उनमें से एक लड़का कुए में उतर चुका था और फिसल कर कुए में गिर गया था...मैंने उसे डूबते हुए देखकर चीखना – चिल्लाना शुरू कर दिया था । मैं जोरों से आवाज ...

तमाम विसंगतियों से परे...तुम अपना सर्वोच्च मकसद चुन सकते हो

                   Note No. '101'                 वही करो जो तुम्हें सही लगता हो...और जो वास्तव में सही भी हो।                                                                                हम जो कुछ भी करते हैं उसपर लोग ऊंगली उठा सकते हैं...हमें उसके लिए बीच में टोक सकते हैं, क्योंकि शायद उनके लिए हमारा उठाया गया सही कदम भी सही ना लगता हो। ये हो सकता हैं वो तुम्हारे सच्चे और बुलंद इरादों को ना समझ पाएं या वे समझने की कोशिश ही ना करते हों अथवा ये भी हो सकता हैं कि उनमें हमारे सही कदमों के प्रति द्वेष की भावना हो...और इस तरह पता नहीं उनकी जाने किस तरह की मैली मानसिकता रहती हैं।...और ये उन लोगों की समस्या हैं कि वे किसी की सर्वोच्च–हितकारी भावनाओं और कामों को समझ नहीं पाते...उनका जमीर ही ऐसा होता हैं कि ...

हम कभी इतने बुरे नहीं होते, कि एक अच्छी शुरूआत ना कर सके!

  Note No. *100*              हम कभी इतने बुरे नहीं होते कि एक अच्छी शुरुआत नहीं कर सकते...ठीक उस फुटबालर की तरह, जिसके बचपन में उससे नादानी वश हुई गलती से उसके मित्र की मौत हो जाती हैं...और मित्र की मौत का जिम्मेदार वो खुद को ठहराता हैं...बहुत लंबे समय तक वो ये हादसा भूल नहीं पाता हैं और मन ही मन खुद को कोसता हैं, उसे इसका दर्द सालता रहता हैं...वो खुद को बहुत बुरा समझ लेता हैं और हरवक्त दुःखी रहता हैं...और तब, जब उसे वाकई किसी के सहारे की ज़रूरत थी...उसके पिता उसके सच्चे हमदर्द साबित होते हैं...और अंततः वही लड़का, जो बिल्कुल डूब सा गया था...अब ब्राजील का महान फुटबालर "पेले" बन चुका होता हैं।                                                                              दरअसल बात ये हैं कि हम किसी तरह की बात अथवा हादसे को लेकर खुद को कोसते ही ना रहे और अपने ...

अवसरों और परिस्थितियों के असंभाव्य संयोजन बेहतरीन परिणाम पैदा करते हैं...

                     Post No. ''99''                    कईं बार अवसरों और परिस्थितियों के असंभाव्य संयोजन बेहतरीन परिणाम पैदा करते हैं।                                                 ये होता हैं कि किसी कार्य के नियोजन में उन अवसरों को समाहित करने से काम बन जाता हैं, जिनका प्रयोग असंभाव्य और मौजूदा परिस्थिति, जिनके बिल्कुल खिलाफ खड़ी होती हैं।...मगर एक दृढ़ निश्चय युक्त लिया गया निर्णय, कार्य को पूर्ण बनाता हैं और हमारी उस धारणा को भी तोड़ना हैं, जो हममें परम्परावादी सोंच एवं संकोच से उत्पन्न होती हैं।                    बहुत बार महत्वपूर्ण प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए संभव से दिखने वाले अवसरों पर गौर किया जाता हैं और इस गलतफहमी में असंभव से दिखने वाले लेकिन उपयोगी अवसरों को उनके असफल होने के भय से नजरंदाज कर दिया...

सबकुछ एक सा कहां रहता हैं...समय के साथ हरेक चीज बदल जाती हैं

                       Note No.  ‘98’                 हमारे बचपन की बहुत सी बातें हमें याद नहीं रहती...फिर भी कुछ बातें, घटनाएं और लोग हमें याद रहते हैं...हम उन्हें भुलाए नहीं भूल सकते।...कुछ लोग यादों में जिंदा थे, जिन्होंने बचपन में मुझे प्यार दिया था...मेरे कुछ संगी साथी भी आजतलक अच्छे से याद थे, जिनके साथ मैंने खूब मस्तियां की थी और बहुत खेल खेले थे। बात तब की हैं, जब मेरे दूध के दांत गिर रहे थे। मुझे अपने दूध के दांतों का टूटना अच्छे से याद था...जब मेरा कोई दांत गिरने वाला होता था, तो मैं उसे अपनी जीभ से इधर–उधर हिलाता, दूसरे दांतों से उसपर दबाव बनाता था...और इस प्रक्रिया में उत्पन्न हुए दर्द से मुझे बेहद सुकून मिलता था। उस वक्त मेरे माता–पिता मेरी दीदी और मुझे लेकर आर्यसमाज संस्था उज्जैन में रहते थे। मेरा एडमिशन नजदीकी निजी प्राइमरी स्कूल में करवाया था, जहां स्कूल के आसपास बारिश के दिनों में काफ़ी गंदगी...

संभावनाओं को कभी भी उनके प्रत्यक्ष मूल्य से ना आंके...

                            Note No. ‘97’                  हमें संभावनाओं को कभी भी उनके प्रत्यक्ष मूल्य से नहीं आंकना चाहिए...हो सकता हैं कि कोई चीज़ बाहर से उतनी प्रभाव परक या उपयुक्त ना दिखती हो, जितनी कि वो होती हैं और वो आपकी आशा से अधिक उपयोगी साबित हो सकती हैं।                   उदाहरण के तौर पर हम कमल के फूल के तनों के बारे में चर्चा कर सकते हैं ;  “खूबसूरत कमल फूल के तने एक स्वादिष्ट एवं मशहूर काश्मीरी व्यंजन ‘नादूर यखनी’ की मुख्य सामग्री होते हैं। पानी के अंदर मिलने वाले ये कमल फूल के रसीले तने उस शोरबे के स्वादों को बड़ी आसानी से सोख लेते हैं, जिसमें इनको पकाया जाता हैं...तदुपरांत इसका लाजवाब और मनभावन स्वाद का जिक्र अवर्णनीय हैं। “                     तो कहा जा सकता हैं कि कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि कमल फूल के तनों से इतनी बेहतरीन पकवान बनाई जा सकती हैं।   ...

मैंने हालातों को बद से बदतर बना लिया था...

            Note  No. ‘96’                 मुझे पता था कि मेरी मौजूदा हालत बेहद खराब थी...मैंने हालातों को बद से बदतर बना लिया था। मैं अच्छी तरह से समझता था कि ये सब मेरे लिए सही नहीं था, फिर भी मैं अनजानी बातों से बेहद परेशान था...मैं घुटता रहता था।...मैं अपने अतीत के पलों को याद करके दुःखी और हताश–निराश हुआ करता था...मैं आने वाले भविष्य के बारे में बेवजह के खयालातों को सोंचकर तकलीफ़ में जीता था। मैं अपने वर्तमान समय के प्रति पूरी ईमानदारी से जवाबदेह नहीं था...हालांकि मुझे भलीभांति विदित और इस महत्व को अच्छी तरह से जानता था कि जिंदगी और कुछ नहीं...बस वह पल या लम्हा हैं जो हम अभी जी रहें हैं और यही हमारा हैं...इसे हमें शिद्दत से जीना चाहिए।...पर मैं क्या कर सकता था...सबकुछ समझते हुए हुए भी तो नासमझ बनता जा रहा था और खुद का बहुत नुकसान करता जा रहा था।                     अत्यंत ह्वास के इस पड़ाव के बाद और बहुत कुछ खो जाने वा खत्म हो जाने के बाद भी आखिरकार मुझे...

बहुत सी चीजें एवं बातें होती हैं, जिनमें बहुत कुछ मूल्यवान निहित रहता हैं

                            Note No. ‘ 95 ’                                                  हम किसी से और कहां से भी प्रेरणा ले सकते हैं। फिर वो प्रेरणास्त्रोत कोई विद्वान या उसके विचार, किताब, फिल्म, कोई वस्तु, कोई बात, कोई आम इंसान, जीव–जंतु अथवा कोई और चीज़ हो...हम किसी से भी कुछ भी सीख सकते हैं...बस हममें इनसे सीखने की वो लगन और निपुणता होनी चाहिए कि हम इनसे क्या कुछ सीख सकते हैं। बहुत सी चीज़े एवं बातें ऐसी होती हैं, जिनमें हमारे लिए बहुत कुछ मूल्यवान निहित होता हैं...पर उस मूल्य को देख पाने या महसूस करने का गुण हर किसी में नहीं होता...कुछ लोग होते हैं, जिनमें वो विवेक होता हैं, जिसके दम पर वे निहित बहुमूल्य को सोख लेते हैं।                 प्रकृति ने विभिन्न वस्तुओं, जीवों घटनाओं एवं अन्यत्र तरीकों के माध्यम से बहुत कुछ उजागर अथवा व्याप्त किया हैं.....

मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...

                                     Note No. ‘94’              मैं समय वर्षों में खो चुका था...और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...अजीब है ना, इंसान कब कितना बेपरवाह और नाकाम हो जाता हैं, उसे पता भी नहीं चलता कि वो इस फेहरिस्त में कितना कुछ खो चुका हैं...भान विहीन होकर इंसान अपने किमती समय को बिना किसी महत्वपूर्ण क्रियाशीलता के व्यर्थ ही गवां देता हैं...वहां समझ का फेर खत्म हो जाता हैं और समय के बहुमूल्य पल अक्सर जाया हो जाते हैं।                                                                     मेरा शरीर और मन जवाब दे चुका था...तब तक मैंने खुद को अत्यधिक बेबस–लाचार बना लिया था...और आखिरकार मैं उस हाल में पहुंच चुका था, जहां से दोबारा उठ पाना लगभग असम्भव लग रहा था...मैं जूझने...

स्थितियां चाहे जैसी भी हो...सामंजस्य स्थापित कर लेना ही समझदारी हैं

                          Note No. ‘93’                            तारीख जून 02, 2018...इस वक्त तक मैं अपने पैतृक गांव नांदेड़ में रह रहा था...मेरा घर गली कूंचे में स्थित था और यहां का परिवेश मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था...फिर भी फिलहाल उस समय वहां रहना मेरी मजबूरी थी, तो रह रहा था। यहां रहते हुए मैं किसी भी तरह की सिविल सर्विस पाने के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था और साथ ही कुछ समय निकालकर लिखता भी था। जिस तरह मुझे विभिन्न विषयों पर तरह–तरह की किताबें पढ़ने का शौक था...वैसे ही ‘लेखन’ भी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा था...और तब मैं ताउम्र लिखने के बारे में भी सोंचा करता था।                      जैसा कि मेरे गांव के उस वक्त के मौजूदा माहौल में मुझे रहना कतई पसंद नहीं था...फिर भी हालातों के मुताबिक समझौता करके खुद को उसमें ढाल लेना ही एक समाधान था और फिर हालांकि स्थितियां चाहे जैसी भी हो, ...

हम हालातों को बद से बदतर और बेहतर से बेहतर बना सकते हैं...

                Note No.'92'     जिंदगी में कुछ भी एकसमान नहीं रहता...समय के साथ सबकुछ बदल जाता हैं...खुशी-नाखुशी, दर्द...सबकुछ! परिवर्तन सृष्टि का नियम हैं, जो सब चीजों और बातों पर लागू होता हैं। हम जो कल थे...वो आज नहीं हैं...फिर आगे ऐसे नहीं होंगे।...हालात बदलते देर नहीं लगती...हम ख़ुद अपने हालातों को बद से बदतर और बेहतर से बेहतर बना देते हैं। ये हमीं पर निर्भर करता हैं कि हम स्वयं को लेकर क्या सोंचते हैं या हम ख़ुद को कितना महत्व देते हैं या ख़ुद को कितना प्यार करते है!         एक तरफ हम उस राह पर भी चल सकते हैं, जहां हमारा वजूद एकदम मामूली, खोखला और नगण्य बनकर रह जाता हैं, तो दूसरी तरफ हम वो रास्ता भी चुन सकते हैं, जो हमें बड़ी उपलब्धियों की ओर ले जाता हैं तथा हमें एक प्रभावशाली इंसान बनाता हैं।...हमें पता होना चाहिए कि हम क्यों और कहां जा रहे हैं अथवा क्या हासिल करना चाहते हैं।...हमें जान लेना चाहिए कि हम जीवन में क्या चुनते हैं और क्या नहीं!                   ©SD. Ar...

‘अल्केमिस्ट, ’ उत्कृष्ट, रोमांचक और बेमिसाल कृति...

                            Note No. '91'              उस समय मैं ‘अल्केमिस्ट’ नाम की किताब का हिन्दी अनुवाद पढ़ रहा था...और हालांकि मुझे बचपन से ही किताबों से बहुत लगाव था।                   यह पुस्तक ब्राजील के लेखक ‘पाओलो कोएलो’ की विश्व प्रसिद्ध रचना हैं और मेरे हिसाब से भी यह एक उत्कृष्ट कृति हैं।...जैसा कि किताब के कवर पेज़ पर लिखा था कि दुनिया की कई प्रमुख भाषाओं में इस किताब का इसका अनुवाद हो चुका हैं...होना भी चाहिए...इतनी महान् रचना हर किसी को बखूबी पढ़ना चाहिए।                                    यह किताब अपने सपनों को साकार करने वाले एक साहसी गड़रीये लड़के की आकर्षक और रोमांचकारी कहानी हैं। वो अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिम्मत जुटाकर सफर पर निकल पड़ता हैं...इस सफ़र में उसे कुछ लोग मिले, जो उसकी मदद करते हैं।...उसे रास्ते में कईं ...

जिंदगी में कुछ लोग ऐसे मिले थे...

          Note No. '90'                   जिंदगी के सफर में मुझे कुछ लोग ऐसे मिले थे, जो हमेशा के लिए यादों में बसकर रह गए थे। फिर चाहे वे मेरे लिए अनजान ही क्यों ना थे, पर अपने खुले व्यवहार और जिंदादिली से उनमें गैरों को अपनी ओर खींच लेने का हुनर था, उनमें एक अलग ही आकर्षण होता था, जो हर किसी को बांध लेता था।... ऐसे लोग अनजाने होकर भी अपनों से थे...वो सच्चे हमदर्द थे...जिन्हें लोगों की तकलीफ का अहसास था।             विपरीत  कुछ लोग ऐसे भी मिले थे, जो पता नहीं दूसरों से सहज क्यों नहीं रहते थे... औरों के प्रति ना जाने किस किस तरह का घृणित व्यवहार अपनाते थे...वो अपने स्वार्थ तक सीमित रहते और और औरों के लिए हीन संकोची भावना रखते थे...वो कभी किसी से घुलमिलर  रहना पसंद नहीं करते थे। वो किसी के दुःख–दर्दों को कभी समझ नहीं पाते थे।...और ऐसे लोग हमारी खुशनुमा यादों के हिस्सा कभी नहीं बन सकते थे...वो स्वतः ही भुला दिए जाते थे !                ...

हम ही तय करते हैं कि हमें क्या बनना हैं...

Note  '89'                                        हम क्या बनेंगे... या बन सकते हैं...ये कौन तय करता हैं..? हम या प्रकृति..? बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी आज की स्थिति के लिए प्रकृति अथवा यूं कहें कि किस्मत नाम की किसी चीज को जिम्मेदार ठहराते हैं । क्या ये सही हैं..? पर मैं सोचता हूं नहीं...बिल्कुल नहीं..! हां प्रकृति हमारी राह में विभिन्न मुश्किल परिस्थितियां अवश्य पैदा करती हैं और हमारी ' नियति ' को पा लेने की महत्त्वाकांक्षी संकल्पना में भी उसका शक्तिशाली विरोधी हस्तक्षेप होता हैं, ताकि हम अपने लक्ष्य से भटक जाएं... उसका प्रयोजन सच्चे विजेता का चुनाव करना होता हैं ! पर प्रकृति हमें अपनी नियति को हासिल करने से रोक नहीं सकती, जबकि हमारे इरादे नेक और मजबूत हों।               और हां, तब भी, जबकि हमें बिल्कुल ये लगता हैं कि हमारे हाथ में कुछ भी नहीं हैं और हमारी जिंदगी अब परिस्थितियों के विभिन्न आयामों से तय होगी... तभी भी विपत्तिपूर्ण दौर के वशीभू...

चेतन–अवचेतन का अंधविश्वासी अंधकार

                          Note No. ' 88 '       काफी सारे लोग ऐसे भी थे, जो अपनी दैनिक जिंदगी में अत्यधिक नियम–पालन करते थे...चाहे वे नियम कायदे बेहूदा व्यर्थ हो...पर वो लोग इस बात से बेखबर होते थे । वे लोग अपने जीवन में काफ़ी फूंक फूंककर कदम कदम रखते थे...वे लोग अपने कामों को लेकर अति सजग किस्म का रवैया अपनाते थे...उन्हें हरदम ये डर लगा रहता था कि हमने ये काम उचित समय, निर्धारित विधि–रीति–रिवाज या निश्चित स्थिति में नहीं किया तो हमारे साथ कुछ अनिष्ट हो जायेगा...बहरहाल अनिष्ट का डर बहुत डराता हैं !...और इस प्रकार वे लोग अपने चेतन एवं अवचेतन मन में महा अंधकार युक्त तथा अति कष्टकारी अंधविश्वास को पैदा करके भयानक डर से डरते रहते थे ।               विभिन्न मिथ्या पहलुओं को अपने जीवन में शामिल करके लोग तरह तरह की बातों का ताना बाना बुनते रहते थे...जैसे किसी काम को करने या कहीं पर जाने की शुरुआत में यदि किसी को छींक आ जाए, तो लोग उस काम को थोड़ी देर बाद करते थे या कहीं जा रहे हो,...

इंसान खुद समस्या पैदा करता है...

                                Note    ' 87 '                                 बहुत से लोग सोचते हैं कि उनके साथ इतनी सारी समस्याएं क्यों हैं...मगर बहुत मौकों पर उनकी ये सोच वहम मात्र होती...वास्तव में अधिकांश समस्याएं इंसान खुद पैदा करता हैं...अर्थात् असल समस्या उसकी नकारात्मक सोंच से पनपती हैं...।               दरअसल व्यक्ति को ये वहम भी होता हैं कि उसकी समस्या बहुत बड़ी और कष्टकारी हैं...और इस फेहरिस्त में वो दूसरों की गंभीर समस्याओं को भी नजरअंदाज कर जाता हैं...वो औरों की अत्यधिक मजबूरियों को देख नहीं पाता !               इंसान अपनी समस्याओं को जितना बड़ा मानेगा वो उतना ही बड़ा रूप धारण कर लेगी और उसे बेबस–लाचार बनाकर उसे हारने पे मजबूर कर देगी...व्याधि के ऐसे मुश्किल हालातों में इंसान की हिम्मत का ना टूटना ही मायने रखता हैं...पर लोग अक्सर यह...

लोगों के अस्तित्व का खोखलापन...

                             " Note No. 86 "                मैं जिस माहौल में पैदा हुआ और जहां मेरा बचपन बीता, वहां मेरे गिर्द रहने वाले लोगों के व्यक्तित्व मुझे मुझे कभी सही नहीं लगे।                   और जहां तक मैंने महसूस किया था, उन लोगों में आपसी तालमेल, प्रेम व सहानुभूति की भावना का अभाव था... उनमें वो सहृदयता मुझे कभी किसी में नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थीं।...और कई लोग तो इतने शातिर माहिर थे कि खुद को अच्छा दिखाने का मिथ्या प्रदर्शन करते थे। जैसे–जैसे मैं कुछ और समझने लगा, वैसे–वैसे मैंने कईं ऐसे पहलुओं पर गौर किया जोकि लोगों के आचार–विचारों की भयावह हकीकत को बयां करते थे! लोगों में एक–दूसरे के प्रति ईर्ष्या द्वेष की भावनाएं कूट–कूट कर भरी पड़ी थी। वे एक दूसरे की उन्नति को देखना पसंद नहीं करते थे...हर कोई चाहता था कि सिर्फ वही आगे बढ़े, बाकि लोग उनसे पीछे ही रहे...दूसरे शब्दों में एक आलसी, नाकारा या दुष्चरित्र व्यक्ति...

मुझपर झूठे आरोप लगते देखा

                            "Note No. 85"              उस रात मैंने एक बुरा सपना देखा था...वो कुछ इस तरह था..., "मुझपर बेवजह के ईल्जाम थोपे जा रहे थे...सब लोग तरह तरह की बातें कर रहे थे...मैं आहत-शोकजदा–हैरान–परेशान था...आखिर क्यों ये लोग मुझपर मिथ्या दोषारोपण कर रहे थे।"           जिन्होंने मुझपर पर आरोप मढ़े थे...वो जानते थे कि मैंने कुछ गलत नहीं किया हैं, कुछ लोग वो थे जिन्हें कुछ पता नहीं था, पर वे आरोप लगाने वालों की बातें आंखें मूंदकर मान रहे थे और अपनी–अपनी मंशाएं रख रहे थे कि इस व्यक्ति ने ये जुर्म किया हैं या हो सकता हैं ना भी किया हो...ठीक से बता बता नहीं सकते। अंततः उनमें थोड़े लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मेरे व्यक्तित्व पर पूरा भरोसा था...वो इस बात को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे...वो हरगिज स्वीकार नहीं कर रहे थे कि मैं कुछ गलत कर सकता हूं...वे लोग मेरे हित में बातें कर रहे थे।           मैं ख़ामोश खड़ा इस मिथ्या आरोप के महाकष्टप्र...

मैं बहुत से काम करना चाहता था...

                      "Note No. 84"                      मैं कितने ही सारे काम करना चाहता था...बहुत अधिक व्यस्त रहना चाहता था...मैं काम में इतना अधिक व्यस्त रहना चाहता था कि चाहे कितना ही थककर चूर हो जाऊं, पर काम करता रहूं...मैं ठहरना नहीं चाहता था। मेरी ख्वाहिश थी कि मेरे पास करने के लिए सारे काम हो कि व्यर्थ की बातों के लिए मुझे ज़रा भी समय ना मिल सके।                          मैं अपने अतीत में व्यर्थ गवाएं हुए पलों की आगे आने वाले वक्त का सदुपयोग कर भरपाई  करना चाहता था। मैं वो सबकुछ करना चाहता था, जिससे दिल को सच्ची खुशी का अहसास हो...मेरे कामों से लोगों में प्यार और खुशहाली का प्रसार हो।                          मैं आज उन श्रेष्ठ कामों को अंजाम देना चाहता था, जिन्हें मैं किसी वजह से गुजर चुके वक्त में नहीं कर पाया था।       ...

मैं तब सोंचा करता था कि काश वो लम्हें फिर से लौट आए...

                        "Note No. 83"                      उस दिन मैं देर तक सोता रहा था...उठने से ठीक पहले तक मैंने एक छोटा सा ख्वाब देखा था...ख़्वाब कुछ यूं था कि...                                                                                                 मैं अपने किसी रिशतेदार के साथ अपने अंकल आंटी के घर जा रहा था...घर पहुंचने के बाद मैं अपनी आंटी के बड़े बेटे महेंद्र से बहुत सी बातें करने लगा...उस से कहने लगा कि मुझे उसकी सगाई वाले फोटो दिखाएं।...वो एल्बम लेके आता हैं और मुझे फ़ोटो दिखाने लगता हैं...फ़ोटो देख कर मैं उन दोनों की जोड़ी को लाज़वाब कहता हूं... कुछ देर में मां की आवाज़ सुनाई देती हैं...छोरा उठ! कब तक सोता रहेगा!...

ऐसा क्यों होता हैं !

                     "Note No. 82"       आखिरकार ऐसा क्यों होता हैं...जबकि सब कोई सच्चाई की बात करते हैं सिर्फ़, पर उसपर अमल कोई नहीं करता..! ऐसा क्यों होता हैं कि लोग दिखाते कुछ और हैं, जबकि उनका असल चेहरा बिल्कुल अलग होता हैं...दरिंदगी से भरा हुआ!                                                                                    स्कूल में सिखाने वाला शिक्षक बच्चों को नैतिक मूल्यों से ओत - प्रोत बातें सीखा सकता हैं, पर वास्तव में खुद अनैतिक हो सकता हैं।                                                                         ...

मेरे लेखन में बाधा

                        "Note No. 81"                  बड़ी आसानी से मैंने लिखना छोड़ दिया था...वो भी उन पलों में जब मुझे ऐसा कुछ लिखना था, जो वाकई लाजवाब हो...हां बिलकुल मेरे जेहन में उस वक्त कईं विचार मौजूद थे...! और हालांकि मैं अपने काव्य संग्रह "ममत्व मंजरी" एवं "शांत सागर" तथा गद्य में दबी आवाज डायरी को दो हिस्सों में तब तक पूरा कर चुका था। तत्पश्चात मैंने अपने महत्वाकांक्षी उपन्यास को लिखने की शुरुआत की थी पर शुरुआत में ही लेखन बाधा से मैं उसे पूरा न कर सका था!                     और आखिरकार काफ़ी लंबे अरसे बाद मैं फिर से लिखने को बेताब था...जुलाई 09, 2017 को मैंने फिर से लिखने की शुरुआत की थी।                                ©SD. Arya        

मेरे दर्द ने हमेशा मुझे दुखी किया

                              Note No. 80           जब इंसान दर्द और तकलीफों से तमाम खाक हो जाए तब, वास्तविक जिंदगी की फिर से शुरुआत कब और कैसे की जा सकती हैं, शायद कभी नहीं...किसी हाल में भी नहीं...और वाकई मैं वहाँ था जहाँ से फिर से कुछ भी शुरू नहीं किया जा सकता था...पर हाँ मैं इस बारे में सोंच तो सकता ही था और शायद ऐसे गंभीर हालातों में किसी भी बात पर सोच-विचार कर लेना ही महत्वपूर्ण होता हैं...ये काफी तो नहीं था, लेकिन फिर भी चाहे झूठी ही सही मगर तसल्ली के लिए ठीक था!...और अब इसी तसल्ली का दामन ही तो मुझे थाम लेना था...बहरहाल मैं और कर भी क्या सकता था...मेरे दर्दों ने मुझे हमेशा से तकलीफ़ ही दी थी, बजाय इसके कि वो मुझे जरा सुकून दे जाते...कुछ दर्द होते हैं जो थोड़ी राहत भी देते हैं...अफ़सोस मेरे पास ऐसा कोई दर्द नहीं था!                                      ©Sd. Arya         ...

वो जन्म देती हैं, तो समझती हैं कि वास्तव में दर्द क्या होता हैं...

            °Note ~ 79°              उसने तुम्हें अनमोल जीवन दिया...पर बदले में तुमसे कभी कुछ नहीं लिया...और आज जब वो तुम्हारे सहारे है, तो तुमने उसे प्रतिफल स्वरुप तंगहाली और अफ़सोसों से भरा जीवन दिया है...वास्तव में तुमने उस माँ को बेहद व्यथित और परेशान किया हैं..!!                                   वो जन्म देती हैं, तो समझती हैं कि दर्द क्या होता हैं...ऐसे ही वो बहुत से वेदनीय दर्दों को भी अपने अंदर समाहित कर लेती हैं, और जाहिर भी नहीं करती!                                      और तुम्हें इस बात का भी अहसास कहाँ कि उस ममतामयी माँ ने तुम्हें जिंदगी में आए हर खतरों से वाकिफ किया और बचाया था...राह तो बहुत भटके थे तुम...पर उसने मार्गदर्शक बन सही रास्ता सुझाया था...और इसी तरह कई और बाधाएं तुम पर बरसी होगी मगर हमेशा तुम्हारे ऊपर उसका छत रूपी साय...

हम भारतीय घातक अंधविश्वासों में सराबोर समाज में रहते हैं

                      ✴️ Note – 78 ✴️           हम भारतीय, घातक अंधविश्वास से सरोबार समाज में रहते हैं...हर रोज इस समाज के घातक प्रहारों से कईं लोग प्रताड़ित शोषित होते हैं...अंधविश्वास और क्रूरतम रीतियों के वशीभूत कइयों ने अपनी ज़िंदगी की आहुतियां दी और आज भी दे रहें हैं।इस मौजूदा समाज के लोग अनर्थ युक्त अनर्गल बातों अथवा कामों व कर्मकांडों में निर्लिल्प रहते हैं । ये शुभ-अशुभ का ताना-बाना बुनते है, न जाने किन किन दोषों के असर से धमकाते हैं, ये विभिन्न भ्रम को उपजाते हैं तथा शनि के कुख्यात भय से लोगों को डराते हैं और खुद भी डरते हैं और यही लोग उन्नति की बातें करते हैं...गजब विरोधाभास हैं अवनति के गर्त में फंसे और फंसाने वाले लोग आखिर कैसे एक स्वस्थ समाज के विकास की परिकल्पना कर सकते हैं..? मसला शोकपूर्ण और चिंताजनक हैं..!                                                       ...

काश इंसान यथार्थता के विभिन्न पहलुओं पर सच्चे दिल से विचार करता...

     💢  Note - 77  💢                                                          मुझे किसी भी तरह का ''वाद'' पसंद नहीं हैं...मैं सभी मामलों में सत्य के महान रहस्य तत्व के निहित होने में यकीन रखता हूँ । लोग अक्सर अपना - अपना एक अलग तबका या समूह बना लेते हैं जो किसी वाद विशेष पर आधारित होता हैं । वे इसके चक्कर में इस तरह से उलझ जाते हैं कि सही गलत को जानने - समझने की कभी कोशिश ही नहीं करते और अवैधानिक भी कर जाते हैं...वे व्यर्थ के अज्ञान में पड़कर आंखें मूंदे अनर्थ में लिप्त होते से लगते हैं, वे कभी उस रहस्य को समझने की कोशिश नहीं करते कि उनके इस प्रपंच से किसी का उद्धार नहीं होने वाला...विपरीत कालांतर में इसके प्रतिकूल परिणाम प्रदर्शित होते हैं । काल के तीव्रतम  रूप में बदलाव के युग के साथ ना चलकर, ये अतिरुढ़ और अभावी मानसिकता से सने लोग खोखले आधार पर सवार होके ना जाने किस तरह के विकास अथवा उन्नति की बातें करते हैं...इ...