सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

सितंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बुरे आंतरिक घुसपैठियों के साथ मेरा संघर्ष।

                      🔸 Note No. *41* 🔸                 बहुत - सी बातें थी, जो मेरे अंदर चलती रहती थी और अक्सर मुझे भ्रम की स्थिति में डाल देती थी । संशय बना ही रहता था पर उनका समाधान नहीं मिल पाता था । उन्हें सुलझा पाने में, मैं सर्वथा असमर्थ ही रहता था और कभी निदान के करीब पहुँचता भी था तो कोई दूसरी बाधा पैदा हो जाती थी...कोई दूसरी...फिर कोई दूसरी और यह सिलसिला चलता ही रहता था । अतः इस तरह से मैं वृथा - मिथ्या भ्रांतियों के जाल में फंसकर अपना बहुत सा कीमती वक्त बर्बाद कर चुका था...मैं उसका असल उपयोग और मूल्य नहीं समझ पाया था । मैं बस उन मनःसृष्ट अनर्गल बातों में मशगूल था जिनका कोई मतलब नहीं था ।            और...आखिरकार एक लंबे अंतराल के गुजर जाने तथा तमाम विरोधाभासों के बावजूद मैंने साहस जुटाकर स्वयं को बदलने का निश्चय किया...मैंने ठान लिया था कि अब मैं किसी भी तरह के निष्प्रयोजन संशयों में उलझकर अपना कीमती बहुमूल्य वक्त जाया नहीं करूँगा । मैं अब संभलने ...

मैंने कभी कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया था

                      Note No. ‘40’                                                                     किसी ने मुझसे पूछा था,  " कि तुमने क्या लक्ष्य बना रखा है ? "  जाहिर है उनका मतलब था कि मैं अपनी जिंदगी में आगे चलकर क्या बनूँगा यानि ऐसा कौनसा काम करूँगा या आखिरकार किस तरह का मकाम हासिल करूँगा जो मुझे पैसा और प्रतिष्ठा दे सके।...अब मैं उनसे क्या कहता...मैं थोड़ी देर खामोश रहा...फिर उनसे कहा कि ऐसी कोई इच्छा मैंने कभी की ही नहीं...इस बारे में मैंने कभी गहराई से सोचा ही नहीं कि अंततः मुझे क्या बनना है..?               तब मैं किसी लक्ष्य विशेष को टारगेट में नहीं रखता था...मैं बस अपना समय बिता रहा था। मेरी कई ख्वाहिशें रही थी, जिन्हें मैं दिल से पूरा करना चाहता था...मैं खुले - अंतहीन आकाश में दूर बहुत दूर  ...

मैं शाश्वत, अनंत और सर्वशक्तिमान ईश्वर की उत्पत्ति और वास्तविक शक्ति में विश्वास करता हूं

                  🔸 Note No. ‘39’ 🔸            जहाँ तक कृष्ण के संबंध में प्रामाणिक जानकारी के हिसाब से मैं उनके वजूद को स्वीकार करता हूँ कि एक श्रेष्ठ एवं योगि - श्रेष्ठ व्यक्ति महाभारत काल में हुए थे । मैं श्री कृष्ण को योगीराज व विज्ञ - महापुरुष मानता हूँ...जिन्होंने महाभारत - महासंग्राम में महान नीतिज्ञ - निर्णायक की भूमिका अदा की थी ।                 और हाँ हमारे विश्व समाज में सदियों से ना जाने किस - किस तरह के कपोल - कल्पित किरदार ऊपजा लिए गए हैं तथा लोगों में उन किरदारों के प्रति मिथ्या आस्था भी उत्पन्न हो चुकी है,जिसका कोई हल फिलहाल तो नामुमकिन सा लगता हैं...खैर!         मैं मूर्तिपूजा , धार्मिक - आडम्बर , अंधविश्वास , रूढ़िवादिताओं , बेतुके रीति - रिवाजों और ऐसे ही कईं प्रकार की मिथ्या क्रियाओं तथा मान्यताओं के सख्त खिलाफ हूँ ।      मैं हृदय से मूल व यथोचित सृष्टि सम्मत आदि सनातन धर्मी हूँ...मैं विशुद्ध तथा ई...

मुझे टीवी देखना बहुत पसंद था

          🔸 Note No. ‘38’ 🔸                  हॉस्टल में रहकर मैंने खूब TV देखा। हमारे वॉर्डन सर हॉस्टल के वॉचमेन  से कहकर जाते थे कि रात 11 बजे से पहले TV बंद करवा देना...लेकिन हम इस हुक्म को मानने वालों में से कहाँ थे...हम देर रात तक टीवी देखते रहते थे । कईं बार हमारे वॉचमेन शास्त्री जी TV ऑफ कर देते थे और सभी को अपने - अपने कमरों में जाके सोने के लिए कहते थे। जब अधिकतर लड़के अपने कमरे में चले जाते थे...उसके बाद मैं और मेरे रूममेट तथा और भी कुछ लड़के आहिस्ता - आहिस्ता अपने कमरे से निकलकर आ जाते और फिर से टीवी चालू करके देखने लगते थे।               बहुत बार ऐसा होता था जब शास्त्री जी रात में बाहर घूमने निकलते और उस वक्त हम TV देख रहे होते तो हम उनकी आहट पाकर झट से टीवी बंद कर देते और कहीं छुप जाते या फौरन अपने कमरों में घुस जाते थे और उनके चले जाने के बाद फिर से टीवी देखने लग जाते...इस तरह हम उन्हें खबर तक नहीं होने देते कि हम tv के पास थे या उन्हें पता चल भी जाता तो भी हम...

मेरे जीवन का बुरा और दर्दनाक समय

                  🔸 Note No. 37 🔸                                ये मैं कहाँ था...क्या कर रहा था...किस तरफ जा रहा था...तथा जिस क्रम को मैंने चुना था वो मुझे कहां तक ले जाने वाला था...कितनी ही उलझनें थी जो अक्सर असमंजस की स्थिति में डाल देती थी !                असुरक्षित वजूद की गिरफ्त में फंसा मैं एक वक्त पर विपत्ति से सने उस पायदान पर जा चुका था जहां मुझे उन सब हालातों से गुजरना पड़ रहा था जिनसे मैं बहुत दूर था...और ये मेरी अफ़सोसजदा बाध्यता ही थी कि उन्हें मैं बर्दाश्त कर रहा था। निश्चित रूप से मैं इतना निस्तब्ध और विवश हो चुका था कि कुछ पहल नहीं कर सकता था...बस ख़ामोश खड़ा देख ही सकता था...आवाज कहां उठा पाता !              वस्तुतः मैं दुर्दशा के दलदल में धंसता जा रहा था...मैं उस अवस्था स्तर की पीड़ा को अंतःप्रकट रूप में महसूस करने लगा था, जिसके प्रतिकूल उत्प्रवाह विघटित होने वाले थे..!...

मुझे सच्चाई के अलग–अलग आयाम महसूस हुए

                    🔸 Note No. 36 🔸                             तब मुझे नहीं पता था कि जिस दौर से मैं गुजर रहा हूँ...वो मेरे लिए सही हैं अथवा गलत और उसके मेरे लिए क्या मायने हैं..?             मैं इस बात से भी बेखबर था कि आने वाला कल मेरे लिए क्या सिला लेकर आएगा..! मेरे लिए जिंदगी के मायने दूसरी तरह के होने लगे थे । मुझे नहीं मालूम था कि मेरे यद्भविष्य की योजनाएं अथवा लक्ष्य क्या होने चाहिए...। मैं जीवन को जिंदादिली से जीने की बजाय उसके होने के असल कारण और मतलब ढूंढने लगा था। दुनिया की विविधता में विद्यमान विभिन्न आयामों में, मैं यथार्थता के गंभीर अहसास को महसूस करता था।             व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों, अधर्मता, पाखंड, भेदभाव, करुणा विहीन क्रूरकृत्य, आचरण - भ्रष्टता इत्यादि तथा और भी कई दोषजन्यताओं को मैंने करीब से जाना था...उनकी बर्बरता को देखा था...और इन्हें देख मुझे बेहद तकलीफ होती थी..! म...

बचपन की कुछ मीठी यादें

                       🤸 Note 35 🤸           बचपन में मुझे गुड़ खाना बेहद पसंद था...मैं खूब गुड़ खाया करता था...इतना ज्यादा कि उसकी वजह से गर्मी के तपते दिनों में कई बार मेरी नाक से खून बहने लगता था।          घर में कितना ही गुड़ क्यों ना रखा हो मैं उसे सफाचट करने की फ़िराक में ही लगा रहता था।          माँ से चोरी - छिपे मैं जार से गुड़ निकालकर बाहर भाग जाता था और खूब आनंदानुभूति के साथ खाता था।          गांव में जहां कहीं गुड़ बनाने का चरखा चलता था, वहां हम बच्चों की टोली पहुँच जाती थी। जब तक गुड़ बनने का सीजन चलता हम सभी वहां जाते रहते थे।उस ताजे बने गुड़ को खाना मजेदार होता था...वह गजब का स्वादिष्ट लगता था।           चरखे वाले हमसे गुड़ देने के बदले थोड़ा काम भी करवाते थे...वो हमसे भट्टी में गन्नों के सूखे गत्ते आदि डलवाते थे...और यदि हम कोई काम नहीं भी करते...तो भी हमें रोजाना खाने के लिए मुफ्त में ग...

मैं रास्ता भटक गया था

                       🔸 Note No. 34 🔸                                                 मैं तब तक सोता रहा था...जब तक सभी अपनी - अपनी मंजिल पाकर वापस लौट आये थे..!                मैं भी अपनी मंजिल पाने की सुखद उम्मीद लिए एक सफर पर निकला था...मगर रास्ते में मिली भूलभुलैया में ऐसा गुम हुआ कि निकल ही नहीं पाया और उसी में कहीं विलीन होने लगा था...और तब तक मुझे होश ही नहीं रहा था कि मेरा ध्येय क्या है।                कई तरह की उलझने थी, जिनसे मैं ऊबर नहीं पाया था। वे सारे लोग जो मेरे साथ चले थे...अपनी मंजिलों को हासिल करके मेरे सामने से गुजर रहे थे...उनके चेहरों पर अपने लक्ष्य को पा लेने की ख़ुशी स्पष्ट देखी जा सकती थी।...और तब मुझे खुद पर तरस भी आया था...लेकिन मैं अब अपनी नाकामी पर अफ़सोस जताने के सिवा और कर भी क्या सकता था....

लोग ऐसे शब्दों या चीजों का इस्तेमाल क्यों करते हैं, जो किसी भी तरह से उचित और उपयोगी नहीं हैं..?

                      🔸 Note No. 33 🔸           लोग मिलते है...और तरह - तरह की बातें करते हैं..! ज्यादातर बातों में बेवजह के शब्द होते हैं।...मैं उनकी बातों को एक अदब से सुन लेता हूँ...समझने की कोशिश करता हूं पर समझ नहीं पाता...पता नहीं वो कितना और क्या - क्या बिना किसी मतलब का बोल जाते हैं...पर आखिर हम क्या कर सकते हैं...शायद कुछ भी तो नहीं..!           वे सभी अपनी बातों को अपने - अपने तरीके से सिद्ध करने पर तुले रहते हैं...और मूल बात से दूर चले जाते हैं।वो कभी भी ये नहीं समझ पाते और ना ही कभी समझने का प्रयास ही करते हैं कि जिन फिजूल की बातों का इस्तेमाल वो खुद के उपजाये मिथ्या विश्वास से और अपनी अल्पज्ञतावश व मनमाने ढंग से किये जा रहे हैं...उनका कोई वांछित लक्ष्य अथवा परिणाम नहीं हैं विपरीत इसके उनकी इन अनर्गल बातों और शब्दों से अन्यत्र संपर्क में आने वाले लोगों को तकलीफ ही होती हैं,और यह कष्ट उन सभ्य जनों के लिए अत्यंत - असहनीय होता है जिनकी अपनी एक मर्यादित जीवन शैली होत...

मेरे बचपन के कुछ बेहतरीन और शानदार दिन

                                                                        🔸3️⃣2️⃣🔸           मेरे बचपन के अधिकतर दिन मेरे मामा के यहां गुजरे थे।मामा के घर रहके मैंने अपने बचपन में खूब मस्तियाँ की।           पहाड़ी पर बसा वह छोटा-सा गांव ऊमराझर मुझे बहुत लुभाता था...यहाँ रहके मैं सुकून महसूस करता था।          इस गांव में 'गुज्जर'(गुर्जर) और 'बंजारा' समुदाय के लोग अधिक संख्या में रहते थे।          यहां मैं अपने साथियों के साथ खूब खेला करता था।हम कई तरह के खेलों में व्यस्त रहते थे, जिनमें अधिकांशतः शारीरिक हलचल से भरे होते थे।हम देर रात तक बाहर खेला करते थे...घर जाने की जल्दी हमें नहीं होती थी...यदाकदा ही घर वालों के दबाववश घरों में जल्दी चले जाते थे...नहीं तो अंधेरा होने से पहले हमें घर में घुसना प...

मेरी आदरणीया बड़ी बहन

                                                                   🔸3️⃣1️⃣🔸                   बचपन में मेरी दीदी मुझे बहुत पीटती थी।मुझे सुधारने की सारी जिम्मेदारी उसने अपने हाथ ले रक्खी थी।       जब कभी मैं मस्ती या शरारत करता अथवा कोई ऐसी हरकत करता,जो उसे बिल्कुल नहीं सुहाती तो फिर वो मेरी झट से धुलाई कर देती थी।...मुझे याद है, वो  मेरा कान भी खूब दबाती थी और तब मैं उसके पूरे नियंत्रण में रहता था फिर वो मुझसे कई बातों को मनवाने की शपथ दिलाती और मैं उसकी  सारी बातों को मानने का उसे विश्वास दिलाता।वाकई बहना की उस मार और प्रताड़ना में अपनत्व का असीम प्यार और स्नेह निहित रहता था।              कभी - कभी तो मैं उसके हाथ नहीं आता तो वो और भी ज्यादा गुस्सा हो जाती और मुझे पकड़ने के लिए मेरे पीछे लग जाती थी...लेकिन...

बस में सवार महिला की परेशानी

🔸3️⃣0️⃣🔸                               ये तब की बात है जब मैं मिडिल स्कूल में पढ़ता था।मैं गांव से अपने आवासीय विद्यालय को बस से जा रहा था । बस यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी...कई यात्री खड़े थे और मैं भी खड़ा था...हालाँकि मैं सीट मिल जाने पर भी अपनी सीट किसी बुजुर्ग अथवा किसी जरुरतमंद को देकर अक्सर खड़ा रहके ही सफर करना पसंद करता था।...उसी बस में एक महिला अपने बच्चे को उठाये खड़ी थी।देखने से पता चल रहा था कि उनकी हालत नाजुक थी और उनका बच्चा बीमार था, जिसका ईलाज करवाने वो शहर जा रही थी।मैंने देखा कि वो अपने बच्चे को उठाकर खड़े रहने में नाकाम हो रही थी...ऊपर से भीड़ की परेशानी अलग।चूंकि वो मजबूत सेहत वाली 'स्त्री' नहीं थी और बच्चे को थामकर खड़े रह पाना उनके लिए लगभग मुश्किल हो गया था।आसपास बैठे और खड़े लोग उनकी परेशानी को स्पष्ट देख रहे थे।मैं यही देखने के लिये इंतजार कर रहा था कि शायद कोई सहृदय व्यक्ति उनकी मदद के लिये तत्परता दिखायेगा...पर अफ़सोस मुझे निराशा ही हाथ लगी ! वहां कोई नहीं था जो उनको अपनी सीट देता...

मैं बहुत जिद्दी बच्चा था

                        🔸 NOte •  2️⃣9️⃣🔸                                    मैं बहुत ज़िद्दी बच्चा था।हर वो चीज,जो मुझे पसंद आ जाती... मैं उसके लिये खूब ज़िद करता था और जब तक उसे पा नहीं लेता तब तक माँ - बाबूजी के सामने ठिठकता रहता या रोता रहता था।कभी - कभी माँ ज्यादा परेशान हो जाती तो फिर मेरी पिटाई कर देती थी और जब कभी ऐसे मौकों पर पिताजी मौजूद रहते, तो मैं दौड़कर उनके पास चला जाता था और वो मुझे माँ की प्रताड़ना से बचा लेते थे।                  मेरे पिताजी ने मुझे कभी नहीं पीटा...वो मुझे बचपन में बहुत लाड़-प्यार करते थे...खैर आज भी करते है पर अब उस तरह जताते नहीं अपितु मेरे प्रति सख्त रवैया अपनाते हैं, जिसमें उनका प्यार निहीत होता हैं।...बचपन में यूंही कभी गुस्से में आकर उन्होंने मुझे एकाध बार झकझोर दिया होगा...और उनका एक ही थप्पड़ मुझे याद हैं।            ...

कुछ अच्छे लोग जीवन में आते हैं

                              🔸 27 🔸                                                            हमारी जिंदगी में कुछ ऐसे लोग भी दस्तक देते है, जो हमेशा के लिए यादों में बसकर रह जाते हैं...वे भुलाये नहीं भूलते।             जब वो हमारे पास होते है तब उनकी अहमियत बढ़ने लगती हैं...वे हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन जाते हैं।...और फिर आगे वो हमारे करीब भले ही ना हो...मगर हमारे दिल में वो हमेशा रहते हैं...हम उन्हें और उनके महत्त्वपूर्ण योगदान को कैसे भुला सकते हैं..!                                                 ©SD. Arya           

मैं किसी की मदद का खयाल रखता हूं

                          ▪️ Note No. 26  ▪️                                      जब कोई मेरी जरा सी भी मदद करता है या फिर उसका, उसकी बातों का अथवा उसके कार्यों का मेरे जीवन में कोई महत्व होता है, तो मैं उस इंसान के इस योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकता।मैं कोशिश करता हूँ कि सामने वाले को इस बात का अहसास हो जाये कि मुझे उनकी मदद के महत्व का ख़याल हैं तथा इसके लिए मैं उनका आभार मानता हूँ और उनकी कद्र करता हूं...मैं उनका शुक्रियादा करना अपना फर्ज समझता हूँ।                और वाकई जब हम किसी को, समाज में उनके योगदान और महत्व के लिए सम्मानित एवं पुरस्कृत करते है तथा उनकी भागीदारी के लिए शुक्रिया अदा करते है, तो उनके दिल को सही मायनों में सुकून मिलता हैं...और हमें भी अच्छा लगता हैं।                               ...

मैं बहुत कुछ व्यक्त नहीं कर पाता था

                            Note No. 25                                        कई बार मैं बहुत कुछ जताने से रह जाता हूँ... शब्दों से कह पाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है, क्योंकि मैं हर बात शब्दों के जरिये कहने में विश्वास नहीं करता।सामने वाले से मेरी ये उम्मीद रहती है कि वो मेरी बात को या तो सीमित शब्दों में समझ ले या कभी स्थितिवश बिन कहे ही मेरे इरादे को महसूस कर जाये...लेकिन ऐसा कहाँ हो पाता हैं..!,जिसे देखो वो शब्दों के अनसुलझे बवण्डर में उलझा रहता हैं..!                                                                                                   ©SD. Arya   ...

हमारे जीवन में सच्चे दोस्तों का महत्व

                        🔸 Note No. 24 🔸                               मैं इस बात को लेकर अक्सर परेशान रहता था और सोचा करता था कि, काश...! मेरे बिल्कुल नजदीक मेरा ऐसा कोई दोस्त हो, जिसपर मैं खुद से भी ज्यादा भरोसा कर सकूँ...जिसे मैं अपना सच्चा हमदर्द समझ सकूँ।              पर अफ़सोस..........!              वाकई जिंदगी में सच्चे दोस्त की बहुत बड़ी उपयोगिता होती हैं।बिना सच्चे मित्र के कुछ भी ख़ुशनुमा तथा खास नहीं लगता एवं ज़िन्दगी नीरस, बोझिल और अधूरी-सी लगने लगती हैं।              हमारा सच्चा मित्र अर्थात वास्तविक शुभचिंतक, हमें कईं तकलीफों से बचाता हैं...वह हमारी परेशानी को खुद की परेशानी से बड़ा मानकर उसका उचित हल निकालता हैं।इस तरह सच्चा मित्र हमारे लिए खुशियों की सौगात लेकर आता है।             वाकई दुनिया में सच्च...

कभी किसी का दिल नहीं दुखाना😔

                                 ०2️⃣3️⃣०                                                                                                                      किसी का दिल तोड़ देना,बहुत बड़ा दोष होता है।मुझे हरवक्त सतर्क रहना पड़ता हैं कि मेरी बातों से, मेरे कार्यों से या मेरे व्यवहार से किसी की भावना आहत ना हो जाये।...सच्ची ! जब किसी का दिल दुखता है ना तो उसे बेहद तकलीफ होती है।            इंसान को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी वजह से कम से कम किसी का दिल ना टूटे।             ...और...ये वास्तविकता है कि जब किसी का सच्चा दिल आहत होकर रोता है, ...