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ये तब की बात है जब मैं मिडिल स्कूल में पढ़ता था।मैं गांव से अपने आवासीय विद्यालय को बस से जा रहा था । बस यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी...कई यात्री खड़े थे और मैं भी खड़ा था...हालाँकि मैं सीट मिल जाने पर भी अपनी सीट किसी बुजुर्ग अथवा किसी जरुरतमंद को देकर अक्सर खड़ा रहके ही सफर करना पसंद करता था।...उसी बस में एक महिला अपने बच्चे को उठाये खड़ी थी।देखने से पता चल रहा था कि उनकी हालत नाजुक थी और उनका बच्चा बीमार था, जिसका ईलाज करवाने वो शहर जा रही थी।मैंने देखा कि वो अपने बच्चे को उठाकर खड़े रहने में नाकाम हो रही थी...ऊपर से भीड़ की परेशानी अलग।चूंकि वो मजबूत सेहत वाली 'स्त्री' नहीं थी और बच्चे को थामकर खड़े रह पाना उनके लिए लगभग मुश्किल हो गया था।आसपास बैठे और खड़े लोग उनकी परेशानी को स्पष्ट देख रहे थे।मैं यही देखने के लिये इंतजार कर रहा था कि शायद कोई सहृदय व्यक्ति उनकी मदद के लिये तत्परता दिखायेगा...पर अफ़सोस मुझे निराशा ही हाथ लगी ! वहां कोई नहीं था जो उनको अपनी सीट देता या फिर उनके बच्चे को उठा लेता।
अंततः मैंने उनसे ये कहते हुए बच्चे को ले लिया कि " आपको परेशानी हो रही है ना, तो अपने बच्चे को मुझे दे दीजिए...इसे मैं उठा लेता हूँ । "
कुछ आगे पहुँचने पर उनको सीट दिलाने में भी कामयाब रहा...और तत्पश्चात ख़ुद में तसल्ली महसूस की ।
©SD. Arya
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