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एक शिक्षक, जिसने जीवन पढ़ाया !

             
                                 Note No. '42'

 
 
   
                       अपने गाँव से कक्षा पाँचवीं (जिला बोर्ड) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरा चयन संभाग स्तरीय शासकीय प्रतिभावान आवासीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, उज्जैन में हुआ। यह चयन मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़ था—एक ऐसा मोड़, जहाँ उत्साह से अधिक अनजानी आशंकाएँ मेरा इंतज़ार कर रही थीं।
जब मैं पहली बार उस विद्यालय परिसर में पहुँचा, तो सबकुछ अपरिचित और कुछ हद तक वियोजित-सा लगा। नया स्कूल, नए शिक्षक, नए चेहरे और एक बिल्कुल अलग वातावरण—मानो मैं अपने परिचित संसार से अचानक बहुत दूर आ गया हूँ। मुझे वहाँ छोड़ने मेरे बड़े भाई आए थे। जब तक वे मेरे साथ रहे, तब तक मैं स्वयं को संभाले रहा; लेकिन जैसे ही वे लौटे, मेरे भीतर का साहस जैसे उनके साथ ही चला गया।
उस रात मैं सो नहीं पाया। मैंने तकिए को अपने चेहरे से सटा लिया और चुपचाप रोता रहा। माँ, बाबूजी और घर के बाकी लोगों की याद हृदय को बार-बार कसक से भर रही थी। इतना रो चुका था कि तकिया आँसुओं से इस कदर भीग गया था, मानो किसी ने उसे पानी में डुबोकर निचोड़ दिया हो। अगले दो-चार दिन भी इसी तरह बीते—माँ-बाबूजी की याद में, भीतर ही भीतर टूटते हुए।
समय, जो हर घाव पर धीरे-धीरे मरहम रखता है, यहाँ भी अपना काम करने लगा। दिन जैसे-तैसे गुजरते रहे। धीरे-धीरे मैं हॉस्टल के अन्य लड़कों से घुलने-मिलने लगा। टीवी हमारे लिए एक अस्थायी सहारा बन गया था—उसके सामने बैठकर हम सब कुछ देर के लिए घर से दूर होने के दुःख को भूल जाते थे।
फिर भी, जब माँ की याद असहनीय हो जाती, तो मैं छुपकर रो लिया करता था। मैं अकेला नहीं था—कई लड़के मेरी ही तरह अपने-अपने दुःख को भीतर समेटे रहते थे। जब कभी किसी छात्र के माता-पिता उससे मिलने आते, तो पूरा हॉस्टल मानो ठहर-सा जाता। बच्चे उन्हें कौतूहल और लालसा भरी दृष्टि से देखते रहते। कुछ अपने माता-पिता से घर चलने की ज़िद करते, और उन्हें देखकर बाकी बच्चों का मन भी उदास हो जाता। वे मुलाक़ातें हमारे भीतर दबे हुए दर्द को फिर से जगा देती थीं।
समय के साथ हम इस वातावरण के अनुकूल हो गए। पढ़ाई में मन लगने लगा। शिक्षक हमें केवल पाठ्यक्रम ही नहीं पढ़ाते थे, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि भी देते थे। धीरे-धीरे मेरी रुचियाँ बढ़ने लगीं। कल्पनाओं की एक नई दुनिया मेरे भीतर आकार लेने लगी। सुखद विचार मन को भरने लगे और मैं स्वयं में एक असाधारण परिवर्तन महसूस करने लगा—एक ऐसा परिवर्तन, जो बाहर से नहीं, भीतर से घटित हो रहा था।
और इस परिवर्तन का उल्लेख करते हुए मैं अपने एक गुरु का नाम लिए बिना नहीं रह सकता—आदरणीय श्री डॉ. घनश्याम दास खत्री सर।
खत्री जी सर केवल एक विषय के शिक्षक नहीं थे; वे जीवन के शिक्षक थे। उनकी बातें साधारण होते हुए भी असाधारण प्रभाव छोड़ती थीं। वे हमें मौलिक, ठोस और जीवन को दिशा देने वाली बुनियादी सच्चाइयों से परिचित कराते थे। उनके शब्दों में अनुभव की दृढ़ता थी और दृष्टि में भविष्य की स्पष्टता।
वे हम सभी विद्यार्थियों को हिंदी भाषा के प्रति विशेष सजगता सिखाते थे—व्याकरण-सम्मत शुद्ध लेखन, स्पष्ट बोलने, ध्यान से सुनने और गहराई से समझने पर वे हमेशा ज़ोर देते थे। उनके लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और व्यक्तित्व की गरिमा का आधार थी।
            डॉ. खत्री जी सर की कही गई आधार-स्तंभ बातें अपने प्रभाव को पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रकट करती दिखती हैं। वे बातें आज भी मार्गदर्शन करती हैं—कठिन निर्णयों में, विचारों की उलझन में और जीवन की जटिलताओं के बीच।
             आज जीवन के इस पड़ाव पर खड़े होकर जब स्मृतियों में झांकता हूँ, तो खत्री जी सर द्वारा बोए गए विचारों के बीज स्पष्ट रूप से फलित होते दिखाई देते हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी मेरे सोचने, समझने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को दिशा देती हैं। वे केवल कक्षा तक सीमित शिक्षक नहीं थे, बल्कि व्यक्तित्व-निर्माण के शिल्पी थे—जिनकी दी हुई दृष्टि समय के साथ और अधिक प्रखर होती चली जाती है। उनके मार्गदर्शन का प्रभाव मेरे जीवन में एक स्थायी आलोक की तरह व्याप्त है। उनके उस अमूल्य गुरुत्व के प्रति मैं आज भी, और आजीवन, गहन श्रद्धा, सम्मान और आत्मिक कृतज्ञता के साथ नतमस्तक हूँ।
                                               ©SD. Arya

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