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नवंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अवसर कैसा भी हो...हमारे लिए जायज़ होता हैं

                        " Note - 72 "             हम अचानक दस्तक देने वाले मौकों, किसी के जबरन उकसाने या यकायक किसी के सहारे अथवा किसी के योगदान से ही अच्छा करने की शुरुआत कर सकते हैं ना कि स्वतः ही कुछ कर गुजरने के प्रण की राह देखते रहें...! अवसर कैसा भी हो हमारे लिये जायज होता हैं, बस शर्त ये हैं कि उसकी जड़ें सत्य की गहराई में धँसी हुई होनी चाहिए।...और ना ही कभी हममें ये संशय उत्पन्न होने चाहिए कि, " क्या हम इतने मामूली हैं कि छोटी - छोटी बातों से ही नहीं ऊबर पा रहें हैं और आखिर हम बेहतर करने का संकल्प क्यों नहीं ले पा रहे हैं या अपनी जीवन शैली में सुधार क्यों नहीं कर पा रहे हैं...इत्यादि ! "             मेरे विचार से इस तरह की मनःस्थिति विघातक होती हैं जो किसी के लिए सही और सुरक्षित नहीं...इसके विपरीत हम तात्कालिक व अजनबी अवसर और वर्तमान का सही और संतुलित समायोजन कर आगे बढ़ सकते हैं...हमें इस बात का हमेशा अहसास रहना चाहिए कि किन्हीं भी परिस्थितियों में हम कभी गलत हो ...

क्योंकि तब मुझे उस ₹500 के नोट में निवेश नजर आ रहा था

                                 " note 71 "                               Sep.23, 2020 आज के दिन जरूरी सामान खरीदने के लिए माँ ने मुझे हाट-बाजार भेजा था।...माँ ने मुझसे लाने वाली तमाम वस्तुओं की सूची लिखवाई और सख्त हिदायत दी कि तू ये-ये सामान लेकर ही आना, क्योंकि उनको पता था कि, मैं सामान खरीदने के मामले में बहुत उदासीन हूँ, जरूरत के सामान भी मैं बहुत सोच समझकर खरीदता था, जब तक बहुत आवश्यक न हो मैं ऐसी किसी भी चीज़ को खरीदने से परहेज करता था, जिसके बिना काम चल जाता था, क्योंकि उस वक्त मैं अपनी Economic स्थिति को Grow करने की राह पर था और इस संबंध में मुझे लापरवाही बर्दाश्त नहीं थी, अतः मैं बहुत सजग एवं सतर्क था।              जब मैं हाट-बाजार में गया तो वहाँ के माहौल को अपने हिसाब से देखने लगा...वहाँ लोगों की बहुत भीड़ थी। विभिन्न वस्तुओं की बहुत सारी दुकानें लगी थी। सब लोग ज़ोर-शोर से अपनी-अपनी जर...

हमारी भावनाओं से खिलवाड़...

                      🎪 Note No. 70 🎪             कभी - कभी  स्थितियों और दृश्यों का बाह्य परिवेश जैसा दर्शित होता है, वैसा असल में होता नहीं है...बल्कि प्रदर्शन स्वरुप हमारे लिए एक भ्रम रचा जाता है, ताकि हमें उसके वास्तविक होने का आभास कराया जा सके। सारा तामझाम कुछ इस तरह रचा-बुना जाता है कि हम उसे नजरअंदाज कर असलियत की तह तक जा ही नहीं पाते...और यहीं से हमारी भावनाओं से खिलवाड़ होता हैं, हमारा गलत तरीके से इस्तेमाल हो चुका होता हैं और हम एक धोके के शिकार हो चुके होते हैं!...हमारे विश्वाश की धज्जियाँ उड़ाकर हमारा तमाशा बना दिया जाता हैं।...और हम!...हम बस उस सम्मुख प्रदर्शित दृश्य को ही बिना सोंचे समझे हकीकत मान बैठते हैं...जबकि माजरा कुछ और ही होता हैं..!!                                                     ©SD. Arya