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वे आगे बढ़ गए और आपको पीछे मुड़कर देखने की कोई जरूरत महसूस नहीं की।

    ' Note-76'           लोग...जो कभी आपके साथ चले थे...आपसे बातें करते थे और तुम्हें अपनेपन का अहसास कराते थे । और फिर जब कभी तुम्हारी जिंदगी में बुरा वक्त आया था और उसमें तुम्हें किसी के सहारे की जरुरत थी, तब ये तुम्हारा साथ छोड़कर तुमसे दूर चले गए थे वो मुँह फेरे बच - बचाकर निकल जाया करते थे । गोयाकि तुम संघर्षरत थे तथा इस बुरे दौर में भी अपने सपने को जी रहे थे पर वो इस बात को कभी महसूस नहीं कर पाए...वो तो बस तुम्हें नाकाम समझते थे उन्हें तुमसे कोई उम्मीद नहीं थी, मतलब तुम उनकी नजरों में किसी भी काम के नहीं थे...वे आगे बढ़ गए और तुम्हें पलटकर देखने की उन्होंने जरा भी जरुरत महसूस नहीं की ।                       शायद इन मुश्किल हालातों में तुम्हें उन लोगों के थोड़े से साथ की जरुरत थी और तुम अपने लिए उनके मुंह से "Best of luck...And don't worry we are always with you." जैसे भाव भी सुनना चाहते थे...पर अफ़सोस!                         ...

हमारी मनोदशा ही हमारे लिए रुकावट और गति तय करता है...

                           🔘  Note - 74 🔘            हम छोटी से छोटी और अति सरल चीज को लेकर परेशान रह सकते हैं, वो हमें मुश्किल लग सकती हैं एवं उसे पूरा करने में हम असफल रह सकते हैं और वहीं हम अत्यंत जटिल मसलों को भी बड़ी ही सुगमता से पूर्ण कर सकते हैं...निर्भर करता हैं कि हम दोनों स्थितियों में खुद को कितना आशावादी, ऊर्जा से भरपूर और आत्मविश्वास से लबरेज एक काबिल तथा संशयों से रहित इंसान समझते हैं।...चूँकि बाहरी वातावरण का हमारे ऊपर नकारात्मक प्रभाव गौण - नगण्य होता हैं, जबकि हम उसे लेकर कुछ ना कर पाने का मिथ्या बहाना बना सकते हैं...बेमतलब की नाकामी का रोना रो सकते हैं।                                  ...हमारी मनोदशा ही हमारे लिए राह में अवरोध और रफ़्तार तय करती हैं!                                       ...

स्वयं का स्पष्ट अध्ययन-विश्लेषण व्यक्ति को महानता की ओर ले जाता है...

                           ''  Note - 73  "             गुरुजनों और अन्य लोगों से अर्जित ज्ञान महत्वपूर्ण तो होता हैं, परंतु तदुपरान्त सर्वोच्च-वास्तविक ज्ञान आत्मचिंतन और भीतर के अवचेतन को समझने से ही प्राप्त होता हैं...स्वयं का साफ-स्वछंद अध्ययन-विश्लेषण व्यक्ति को महानता की ओर अग्रसर करता हैं…वैसे भी इंसान को खुद का विशुद्ध मंथन करते रहना चाहिए।                                                                                बहरहाल हम किसी से कुछ भी सीख सकते हैं, लेकिन हम स्वायत्तता से अपने अंदर के ज्ञान, विवेक, चेतना और बुद्धि का उपयोग करके भी सत्यार्थ ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं...वस्तुतः हम खुद में प्रज्ञा-प्रखरित कर सकते हैं।              ...

अवसर कैसा भी हो...हमारे लिए जायज़ होता हैं

                        " Note - 72 "             हम अचानक दस्तक देने वाले मौकों, किसी के जबरन उकसाने या यकायक किसी के सहारे अथवा किसी के योगदान से ही अच्छा करने की शुरुआत कर सकते हैं ना कि स्वतः ही कुछ कर गुजरने के प्रण की राह देखते रहें...! अवसर कैसा भी हो हमारे लिये जायज होता हैं, बस शर्त ये हैं कि उसकी जड़ें सत्य की गहराई में धँसी हुई होनी चाहिए।...और ना ही कभी हममें ये संशय उत्पन्न होने चाहिए कि, " क्या हम इतने मामूली हैं कि छोटी - छोटी बातों से ही नहीं ऊबर पा रहें हैं और आखिर हम बेहतर करने का संकल्प क्यों नहीं ले पा रहे हैं या अपनी जीवन शैली में सुधार क्यों नहीं कर पा रहे हैं...इत्यादि ! "             मेरे विचार से इस तरह की मनःस्थिति विघातक होती हैं जो किसी के लिए सही और सुरक्षित नहीं...इसके विपरीत हम तात्कालिक व अजनबी अवसर और वर्तमान का सही और संतुलित समायोजन कर आगे बढ़ सकते हैं...हमें इस बात का हमेशा अहसास रहना चाहिए कि किन्हीं भी परिस्थितियों में हम कभी गलत हो ...

क्योंकि तब मुझे उस ₹500 के नोट में निवेश नजर आ रहा था

                                 " note 71 "                               Sep.23, 2020 आज के दिन जरूरी सामान खरीदने के लिए माँ ने मुझे हाट-बाजार भेजा था।...माँ ने मुझसे लाने वाली तमाम वस्तुओं की सूची लिखवाई और सख्त हिदायत दी कि तू ये-ये सामान लेकर ही आना, क्योंकि उनको पता था कि, मैं सामान खरीदने के मामले में बहुत उदासीन हूँ, जरूरत के सामान भी मैं बहुत सोच समझकर खरीदता था, जब तक बहुत आवश्यक न हो मैं ऐसी किसी भी चीज़ को खरीदने से परहेज करता था, जिसके बिना काम चल जाता था, क्योंकि उस वक्त मैं अपनी Economic स्थिति को Grow करने की राह पर था और इस संबंध में मुझे लापरवाही बर्दाश्त नहीं थी, अतः मैं बहुत सजग एवं सतर्क था।              जब मैं हाट-बाजार में गया तो वहाँ के माहौल को अपने हिसाब से देखने लगा...वहाँ लोगों की बहुत भीड़ थी। विभिन्न वस्तुओं की बहुत सारी दुकानें लगी थी। सब लोग ज़ोर-शोर से अपनी-अपनी जर...

हमारी भावनाओं से खिलवाड़...

                      🎪 Note No. 70 🎪             कभी - कभी  स्थितियों और दृश्यों का बाह्य परिवेश जैसा दर्शित होता है, वैसा असल में होता नहीं है...बल्कि प्रदर्शन स्वरुप हमारे लिए एक भ्रम रचा जाता है, ताकि हमें उसके वास्तविक होने का आभास कराया जा सके। सारा तामझाम कुछ इस तरह रचा-बुना जाता है कि हम उसे नजरअंदाज कर असलियत की तह तक जा ही नहीं पाते...और यहीं से हमारी भावनाओं से खिलवाड़ होता हैं, हमारा गलत तरीके से इस्तेमाल हो चुका होता हैं और हम एक धोके के शिकार हो चुके होते हैं!...हमारे विश्वाश की धज्जियाँ उड़ाकर हमारा तमाशा बना दिया जाता हैं।...और हम!...हम बस उस सम्मुख प्रदर्शित दृश्य को ही बिना सोंचे समझे हकीकत मान बैठते हैं...जबकि माजरा कुछ और ही होता हैं..!!                                                     ©SD. Arya

तुम कौन हो?, इसके स्थितिवश कईं अर्थ निकलते हैं!

                          ' Note No. ' 69 ' .                                                                                                              तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कोई तुम्हारे बारे में क्या सोचता हैं, पर तकलीफ तो तब होती हैं और बहुत होती हैं, जब वो शख्स जो तुम्हें बहुत अच्छे से जानता हैं, तुम्हारी अच्छाइयों को समझता हैं और फिर अचानक से वही आके तुमसे कहता हैं कि तुम गलत हो! दोषारोपित करते हुए वह कहता हैं कि तुम कौन हो!?, तुम्हारा वजूद ही क्या हैं!?...ये उस इंसान के लिए असहनीय और अत्यंत पीड़ादायक होता हैं, स्वतः ही वो अनादर के संतापी घूँट को पीता हैं, जो हलक में ही अटक कर रह जाता हैं और शूल की मानिंद कण्ठ में चुभता हैं।...और...त...

वैसे चाहो तो तुम किसी के सपनों पर हँस सकते हो...और बेमतलब उसके लिए जरा रुक सकते हो....

                    Note No. '68'               देने का सुख दाता को परम आनंद प्रदान करता हैं... वैसा सुख नहीं जिसमें कि किसी को कुछ देकर संसार में प्रसिद्धि पाने का स्वार्थ लक्षित होता हैं, अपितु ऐसा आनंद, जो देने वाले को बिना किसी स्वार्थ के किसी जरूरतमंद की वास्तविक मदद के उपरांत मिलता हैं...अगाध-अटूट और पवित्र प्रेम भी ऐसी धारा में प्रवाहित होता हैं...अशुद्धि अथवा अपूर्णता से विहीन...हमेशा पाक-साफ!                                                            लोगों के पास किसी न किसी के लिए कुछ ना कुछ देने के लिए अवश्य ही होता हैं...मगर कभी-कभी कोई ऐसा भी होता हैं, जिसके पास किसी को देने के लिए कभी कुछ नहीं होता... खुशी, वक्त, दोस्ती और प्यार...शायद कुछ भी नहीं!...बहरहाल वो अपनी नियति को पाने की कोशिश में अनवरत लगा रहता हैं...वैसे चाहो तो तुम ऐसे शख्स के स...

भीरुता लोगों के अंदर तक धँस जाती हैं और प्रमादों की विभिन्न परतों के प्रभाव से लोगों का ज़मीर दोषपूर्ण हो जाता हैं!!

                          "Note No. 67"              समाज के विभिन्न मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाजों में उलझकर रह जाना और उनके अनुरूप खुद को ढाल लेना ही तुम्हारे कमज़ोर चरित्र को दिखाता हैं...तुम्हारी बुज़दिली को दिखाता हैं...और ये दर्शाता हैं कि तुम्हारा किरदार कितना हीन अथवा तुच्छ हैं, जोकि अन्यथा ही गुलामी को ढो रहा हैं और एक बोझिल जिंदगी जी रहा हैं...याद रहे, इंसान का किरदार महत्वपूर्ण हैं!                                                                                 नज़रिया मेरा हो या मेरे जैसे किसी और का हो ये सरासर गलत ही हैं...मैं कभी ऐसी पाबन्दियों का मोहताज़ नहीं रहा और ना ही कभी हो सकता हूँ। मैंने हमेशा अपने दिल की आवाज़ सुनी हैं, वैसे हर किसी को सुननी चाहिए, जो बहुत कुछ कहती हैं और एक...

मैं पूँजी, व्यवसाय और मौद्रिक आय की Importance को बखूबी समझता था।

                  'Article  No.  66'                                 लापरवाहियों की भी हद होती हैं और मैंने तो लापरवाही की सारी हदें पार कर दी थी। फिर भी ऐसे वक्त में भी मैं Financially बहुत अलर्ट रहता था, चाहे वक्त मेरा बुरा था, लेकिन तभी भी मैं आर्थिक मामलों को लेकर हमेशा सजग रहता था...मैंने उस Field में उतनी लापरवाही नहीं की, जितनी कि अन्य और कहीं। मैं पूँजी, व्यवसाय और मौद्रिक आय की Importance को बखूबी समझता था और इन सब पर बहुत विचार भी करता था।...मैं तब भी Income के विभिन्न Sources एवं निवेश के अलग-अलग प्रकारों के बारे में सोंचा करता था, जबकि मैं निहायत ही Difficult और Opposite Situation में था...Problems जोकि मेरे बिल्कुल Against थी, But में इन सब बातों के बावजूद 'Power of Money' को अच्छे से जानता और समझता था...बहरहाल मैं उसके असर को क्यों और कैसे भूल सकता था।                 विरोधाभासों के बावजूद मैंने ...

मेरे शिक्षक, जिनका मैं दिल से बहुत सम्मान करता था, लेकिन उन्होंने वास्तव में मुझसे कभी सहानुभूति नहीं रखी थी

                "Note No. 65"        कहानी तब की हैं, जब मैं Class 11th का Student था। उस वक्त एक रोज मैंने अपने School के Principal Sir के हाथों बहुत मार खाई थी, और उनसे मिले निरीह अपवाद को सहा था...मेरा कोई दोष अथवा गलती नहीं थी...और अगर दोष होता भी तो कोई किसी को इस तरह से कलंकित नहीं करता हैं।...बस मेरे पास Cellphone था तथा स्कूल के Rules & Regulations के मुताबिक School में विद्यार्थियों को Cellphone लाना वर्जित था।...निश्चित ही उन्हें मुझे प्रताड़ित करने व पीटने का कोई बहाना चाहिए था, जोकि मेरे पास Mobile Phone उपलब्ध होने से उन्हें वो बहाना मिल गया था। वैसे School में और भी बहुत से लड़कों के पास Cellphone थे, पर कभी किसी पर इतनी सख्ती नहीं दिखाई गई जितनी कि मुझपर ! उस एक बात से शुरू करके साथ ही कईं और आरोप-प्रत्यारोप लगाकर मुझे उस दिन बहुत पीटा था...कितना ही गुस्सा मुझपर उड़ेल दिया था। मेरा फ़ोन ज़ब्त कर लिया गया। उन्होंने मुझे थप्पड़, घूँसे और छड़ी से मारा और बहुत देर तक तिरस्कृत और मानहानि से भरी बातों से अपमानित किया था.....

मैं दोस्ती को कभी जाहिर या साबित नहीं कर पाता था

                      Article No. ‘64’              यकीनन ये बात सच थी कि मैं रिश्तों और दोस्ती को कभी वक्त नहीं दे पाया था, काश कभी दे पाता, और लोगों की तरह मैं दोस्तों की ख़ुशियों और उनके उत्सवों में कभी शामिल भी नहीं हो पाता था, शायद कभी हो पाता! इन सभी मामलों में, मैं थोड़ा आलसी, लापरवाह था या फिर थोड़ा सीमित और संकोची भी! लेकिन हाँ अमूनन ये चीजें मुझे व्यक्तिगत रूप से पसंद भी नहीं थी...जैसेकि मुझे लोगों के दोस्ती में किये व रचे गये झूठे प्रपंच जरा भी पसंद नहीं थे।                                                          हालाँकि मैं दोस्ती को कभी जाहिर या साबित नहीं कर पाया था...इसमें उचित अवसर एवं मौकों का न होना भी एक अहम बात थी...खैर!...और दोस्ती के कायदे भी मुझे कभी मालूम न थे ना ही मैंने उनको कभी जानने की कोशिश ही की थी।...फिर भी मेरा हमेशा से यही सो...

बहुत बार चीजें सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ती, क्योंकि जोड़ने का हुनर लोगों को पता नहीं होता!

                 Note No.63         कभी-कभी चीजें जैसे टूटती हैं, वैसे जुड़ भी जाती हैं, फिर चाहे वो कुछ भी हो...रिश्ते, सपने, मनोबल, उम्मीदें या कुछ और...जोड़ना आना चाहिए...सबकुछ जुड़ जाता हैं।।                                                                                           बहुत बार चीजें सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ती क्योंकि उन्हें जोड़ने का हुनर लोगों को पता नहीं होता।...सब खेल हुनर का ही हैं...हुनरमंद लोग कईं चीजों पर महारत हासिल कर लेते हैं...कितनी ही चढ़ाईंयाँ चढ़ जाते हैं...फिर चाहे दुर्गम पहाड़ों या Mount Everest(Himalaya) की अत्यंत ऊँची चढ़ाई ही क्यों न हो।।                                      ...

मैंने सुख कहीं और पाया और महसूस किया...

                         "Note No. 62"                      वैसे तो मैंने थोड़े मौकों पर किसी न किसी को कुछ न कुछ Thank You Notes भेजे थे, पर ज्यादा नहीं... हालाँकि मैं हमेशा से लोगों के प्रति आभार व्यक्त करना जरूरी समझता था, पर लोगों के लिए जिसकी कोई Value नहीं थी।               मुझे शादी-पार्टी और विविध उत्सवों से हमेशा परहेज रहता था, उनमें शरीक होना कभी अच्छा नहीं लगता था और ना ही तब वहाँ लोगों के साथ व्यर्थ की गपशप करना या वहाँ जाके सबके सामने चाव से खाना, खाना ही मुझे कभी पसंद नहीं आता था। इस तरह ऐसे मौकों पर कभी-कभी मजबूरन ही मैं शामिल होता था। https://www.instagram.com/reel/CSmd5P3lLLL/?utm_medium=copy_link                बहुत कम मौकों पर मैंने लोगों को Anniversary, Wedding Anniversary की Blessings दी थी। बहुत कम या लगभग न के बराबर मैंने लोगों को उनका Birthday Wish किया था। ना ही मैंने कभी...

मेरी खास दोस्त को पत्र, वो एक बेतरीन मित्र थी

                       " Note No. 61 "        Dear,            Well thanks...उन सभी बातों के लिए, जिसमें कि तुम मेरी इतनी कद्र करती हो और जिसके कि मैं वैसे भी बिल्कुल लायक नहीं हूँ...तुम हमेशा मेरे लिए तत्पर और समर्पित-सी भावनाओं को महसूस करती हो और साथ ही मुझे ये अहसास भी कराती थी कि तुम मेरे प्रति कितनी वफ़ादार हो, जबकि मैं तुम्हारे प्रति उतना तत्पर और वफ़ादार कभी नहीं रहा और ना ही कभी हो सकता हूँ।...कितनी ही और भी बहुत कुछ बातें हैं, जिनके लिए मैं तुम्हारा दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। साथ ही मैं तुमसे ये प्रार्थना और आशा भी करता हूँ कि मेरे बारे में तुम्हें ज्यादा नहीं सोंचना चाहिए...ना ही अधिक भावुक होना चाहिए।...किसी के लिए इतनी बेहिसाब चाहत अच्छी नहीं होती...और इतनी तीव्रतम चाहत वहीं होती हैं, जहाँ युगल एक-दूसरे को बेइंतेहा प्यार करते हैं और उन दोनों की नियति एक-दूजे के प्यार को पा लेने की होती हैं...और अगर उनका प्यार समर्थ न भी हो पाए तब भी वो एक-दूसरे के लिए सम्पूर्...

60. तुम्हारी साँसों का चलना ही महत्वपूर्ण हैं...

                  Note   No. 60                           मुसीबतें कभी बताकर नहीं आती और जब आ जाती हैं, तो फिर आसानी से जाने का नाम भी नहीं लेती।बदनसीब हैं वो लोग जिनपर आफतों का पहाड़ टूट पड़ता हैं...और शायद मैं भी उसी वर्ग का एक हिस्सा हूँ, जो दुर्भाग्यवश जिंदगी से जुड़ी आफतों से जूझ रहा हूँ।          बहुत बार समस्याओं के समाधान कभी नहीं  मिलते...और ना ही उनका कोई छोर...बस उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता हैं...उनके साथ ही घुटकर जीना होता हैं...उनके दर्द को बखूबी सहना होता हैं। इंसान दर्द से आक्रांत होकर रोता हैं, बिलखता हैं, तड़पता हैं किंतु चाहकर भी किसी निष्कर्ष-निवारण पर नहीं पहुंच पाता।...तत्पश्चात दर्द अथवा कष्ट का अतिरेक हो जाता हैं, जो जीवन को नितांत कमजोर कर देता हैं...आस्था, विश्वास और उम्मीदें सबकुछ लगभग टूट सी जाती हैं, जीवन निरुद्देश्य तथा सारहीन लगने लगता हैं और किसी बड़ी-पुरानी जर्जर हो चुकी ईमारत की भाँति भरभरा कर धराशायी हो जाता हैं। ...

59. मैं जवाबों के घेरों से मुक्ति चाहता था!!

                        "Note  No. 59"                                                                                                        बहुत  बार  मैं   लोगों के सवालों का समुचित और सुव्यवस्थित जवाब देता था...निष्ठा और विश्वास के साथ लगभग एक संतुष्ट जवाब, पर बहुत बार मेरे पास लोगों के छोटे-छोटे और आसान-से सवालों के जवाब भी नहीं होते थे और कभी जवाब होते भी, तो कुछ सवालों के जवाब देना मुझे कभी सही नहीं लगता था...बातें बहुत हैं!            विभिन्न लोगों के विभिन्न सवाल होते थे...और मैं बस चुप हो जाता था, तब मैं जवाबों के घेरों से मुक्ति चाहता था...उस वक्त मैं किसी को कुछ नहीं कहना चाहता था...वास्तव में, मैं अपने मौन...

58. वो चले जाते है, मगर पीछे कितनी ही निशानियां छोड़ जाते हैं, जो कितने ही संकेतों और अर्थों को उत्पन्न करती हैं!!

                                Note No. '58'                                          जो लोग सच्चे दिल से हमें चाहते हैं, हमारी परवाह करते हैं, असल में वही हमारे अपने होते हैं, बाकी सब दिखावा हैं...छलावा हैं!...वास्तव में वो हमारे बारे में जो कुछ सोंचते हैं, करते हैं अथवा हमारे लिए जो कुछ कहते हैं, उसके सच में बहुत मायने होते हैं। कभी महसूस करके देखो, हमारे लिए उनके द्वारा कही गई बातों में गहरे अर्थ और हमारे हित निहित होते हैं...पर कईं मर्तबा हम ऐसी अर्थपूर्ण और हितकारी बातों से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते हैं और ना ही उनके अर्थों को समझ वा महसूस ही कर पाते हैं, पर ऐसा नहीं होना चाहिए...वक्त रहते ऐसी चीजों को समझ लेना चाहिए...हमारे प्रति उनकी सहानुभूति, प्रेम, वफ़ा अथवा आत्मीय भावों की कद्र कर लेनी चाहिए...नहीं तो फिर अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं बचता...ऐसा अफ़सोस जो हमें सालता रहता हैं...हमेशा-हमेशा!!...