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वैसे चाहो तो तुम किसी के सपनों पर हँस सकते हो...और बेमतलब उसके लिए जरा रुक सकते हो....

                   Note No. '68' 

            देने का सुख दाता को परम आनंद प्रदान करता हैं... वैसा सुख नहीं जिसमें कि किसी को कुछ देकर संसार में प्रसिद्धि पाने का स्वार्थ लक्षित होता हैं, अपितु ऐसा आनंद, जो देने वाले को बिना किसी स्वार्थ के किसी जरूरतमंद की वास्तविक मदद के उपरांत मिलता हैं...अगाध-अटूट और पवित्र प्रेम भी ऐसी धारा में प्रवाहित होता हैं...अशुद्धि अथवा अपूर्णता से विहीन...हमेशा पाक-साफ!                                                           लोगों के पास किसी न किसी के लिए कुछ ना कुछ देने के लिए अवश्य ही होता हैं...मगर कभी-कभी कोई ऐसा भी होता हैं, जिसके पास किसी को देने के लिए कभी कुछ नहीं होता... खुशी, वक्त, दोस्ती और प्यार...शायद कुछ भी नहीं!...बहरहाल वो अपनी नियति को पाने की कोशिश में अनवरत लगा रहता हैं...वैसे चाहो तो तुम ऐसे शख्स के सपनों पे हँस सकते हो...और बिना किसी वजह के हाँ मगर बेवज़ह ही सही तुम उसके लिए जरा रुक सकते हो...यद्यपि वो न जाने कहाँ जा चुका होता हैं?!...फिर भी तुम उसके लौट आने का वास्तविक इंतजार कर सकते हो!...और बहुत बार इंतजार प्रेम की पराकाष्ठा तथा उसकी शुचिता और सार्थकता को भी साबित करता हैं...तथापि फिर इंतजार भी उस दर्जे का होना चाहिए... एक सतत-साभार-संयमित इनायती निर्मल, जिसमें कभी कोई अफ़सोस या शिकायत की आवाज़ नहीं होती...बस आखिर दम तक किसी के लौट आने का सद्भावी इंतजार ही अंतर्निहित होता हैं...एक इंतजार बस बेहद इंतजार..!!

                                         ©SD. Arya

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