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मैं पूँजी, व्यवसाय और मौद्रिक आय की Importance को बखूबी समझता था।

                  'Article  No.  66'                                 लापरवाहियों की भी हद होती हैं और मैंने तो लापरवाही की सारी हदें पार कर दी थी। फिर भी ऐसे वक्त में भी मैं Financially बहुत अलर्ट रहता था, चाहे वक्त मेरा बुरा था, लेकिन तभी भी मैं आर्थिक मामलों को लेकर हमेशा सजग रहता था...मैंने उस Field में उतनी लापरवाही नहीं की, जितनी कि अन्य और कहीं। मैं पूँजी, व्यवसाय और मौद्रिक आय की Importance को बखूबी समझता था और इन सब पर बहुत विचार भी करता था।...मैं तब भी Income के विभिन्न Sources एवं निवेश के अलग-अलग प्रकारों के बारे में सोंचा करता था, जबकि मैं निहायत ही Difficult और Opposite Situation में था...Problems जोकि मेरे बिल्कुल Against थी, But में इन सब बातों के बावजूद 'Power of Money' को अच्छे से जानता और समझता था...बहरहाल मैं उसके असर को क्यों और कैसे भूल सकता था।                 विरोधाभासों के बावजूद मैंने ...

मेरे शिक्षक, जिनका मैं दिल से बहुत सम्मान करता था, लेकिन उन्होंने वास्तव में मुझसे कभी सहानुभूति नहीं रखी थी

                "Note No. 65"        कहानी तब की हैं, जब मैं Class 11th का Student था। उस वक्त एक रोज मैंने अपने School के Principal Sir के हाथों बहुत मार खाई थी, और उनसे मिले निरीह अपवाद को सहा था...मेरा कोई दोष अथवा गलती नहीं थी...और अगर दोष होता भी तो कोई किसी को इस तरह से कलंकित नहीं करता हैं।...बस मेरे पास Cellphone था तथा स्कूल के Rules & Regulations के मुताबिक School में विद्यार्थियों को Cellphone लाना वर्जित था।...निश्चित ही उन्हें मुझे प्रताड़ित करने व पीटने का कोई बहाना चाहिए था, जोकि मेरे पास Mobile Phone उपलब्ध होने से उन्हें वो बहाना मिल गया था। वैसे School में और भी बहुत से लड़कों के पास Cellphone थे, पर कभी किसी पर इतनी सख्ती नहीं दिखाई गई जितनी कि मुझपर ! उस एक बात से शुरू करके साथ ही कईं और आरोप-प्रत्यारोप लगाकर मुझे उस दिन बहुत पीटा था...कितना ही गुस्सा मुझपर उड़ेल दिया था। मेरा फ़ोन ज़ब्त कर लिया गया। उन्होंने मुझे थप्पड़, घूँसे और छड़ी से मारा और बहुत देर तक तिरस्कृत और मानहानि से भरी बातों से अपमानित किया था.....

मैं दोस्ती को कभी जाहिर या साबित नहीं कर पाता था

                      Article No. ‘64’              यकीनन ये बात सच थी कि मैं रिश्तों और दोस्ती को कभी वक्त नहीं दे पाया था, काश कभी दे पाता, और लोगों की तरह मैं दोस्तों की ख़ुशियों और उनके उत्सवों में कभी शामिल भी नहीं हो पाता था, शायद कभी हो पाता! इन सभी मामलों में, मैं थोड़ा आलसी, लापरवाह था या फिर थोड़ा सीमित और संकोची भी! लेकिन हाँ अमूनन ये चीजें मुझे व्यक्तिगत रूप से पसंद भी नहीं थी...जैसेकि मुझे लोगों के दोस्ती में किये व रचे गये झूठे प्रपंच जरा भी पसंद नहीं थे।                                                          हालाँकि मैं दोस्ती को कभी जाहिर या साबित नहीं कर पाया था...इसमें उचित अवसर एवं मौकों का न होना भी एक अहम बात थी...खैर!...और दोस्ती के कायदे भी मुझे कभी मालूम न थे ना ही मैंने उनको कभी जानने की कोशिश ही की थी।...फिर भी मेरा हमेशा से यही सो...