Article No. ‘64’
यकीनन ये बात सच थी कि मैं रिश्तों और दोस्ती को कभी वक्त नहीं दे पाया था, काश कभी दे पाता, और लोगों की तरह मैं दोस्तों की ख़ुशियों और उनके उत्सवों में कभी शामिल भी नहीं हो पाता था, शायद कभी हो पाता! इन सभी मामलों में, मैं थोड़ा आलसी, लापरवाह था या फिर थोड़ा सीमित और संकोची भी! लेकिन हाँ अमूनन ये चीजें मुझे व्यक्तिगत रूप से पसंद भी नहीं थी...जैसेकि मुझे लोगों के दोस्ती में किये व रचे गये झूठे प्रपंच जरा भी पसंद नहीं थे। हालाँकि मैं दोस्ती को कभी जाहिर या साबित नहीं कर पाया था...इसमें उचित अवसर एवं मौकों का न होना भी एक अहम बात थी...खैर!...और दोस्ती के कायदे भी मुझे कभी मालूम न थे ना ही मैंने उनको कभी जानने की कोशिश ही की थी।...फिर भी मेरा हमेशा से यही सोचना था कि जब कभी जरूरत पड़ेगी और वाकई कोई पूरी निष्ठा तथा विश्वास की भावना से जिंदगी में कभी भी मुझपर भरोसा करता हैं, तो फिर वादा रहा...पूरी शिद्दत से मैं अपनी दोस्ती का फर्ज अदा कर जाऊँगा...और शायद दोस्ती के लिए ये एक प्रमुख बात होनी चाहिए, जोकि मेरे अंदर स्वाभाविक रूप से विद्यमान थी!
©SD. Arya

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