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सबकुछ एक सा कहां रहता हैं...समय के साथ हरेक चीज बदल जाती हैं

                       Note No.  ‘98’                 हमारे बचपन की बहुत सी बातें हमें याद नहीं रहती...फिर भी कुछ बातें, घटनाएं और लोग हमें याद रहते हैं...हम उन्हें भुलाए नहीं भूल सकते।...कुछ लोग यादों में जिंदा थे, जिन्होंने बचपन में मुझे प्यार दिया था...मेरे कुछ संगी साथी भी आजतलक अच्छे से याद थे, जिनके साथ मैंने खूब मस्तियां की थी और बहुत खेल खेले थे। बात तब की हैं, जब मेरे दूध के दांत गिर रहे थे। मुझे अपने दूध के दांतों का टूटना अच्छे से याद था...जब मेरा कोई दांत गिरने वाला होता था, तो मैं उसे अपनी जीभ से इधर–उधर हिलाता, दूसरे दांतों से उसपर दबाव बनाता था...और इस प्रक्रिया में उत्पन्न हुए दर्द से मुझे बेहद सुकून मिलता था। उस वक्त मेरे माता–पिता मेरी दीदी और मुझे लेकर आर्यसमाज संस्था उज्जैन में रहते थे। मेरा एडमिशन नजदीकी निजी प्राइमरी स्कूल में करवाया था, जहां स्कूल के आसपास बारिश के दिनों में काफ़ी गंदगी...

संभावनाओं को कभी भी उनके प्रत्यक्ष मूल्य से ना आंके...

                            Note No. ‘97’                  हमें संभावनाओं को कभी भी उनके प्रत्यक्ष मूल्य से नहीं आंकना चाहिए...हो सकता हैं कि कोई चीज़ बाहर से उतनी प्रभाव परक या उपयुक्त ना दिखती हो, जितनी कि वो होती हैं और वो आपकी आशा से अधिक उपयोगी साबित हो सकती हैं।                   उदाहरण के तौर पर हम कमल के फूल के तनों के बारे में चर्चा कर सकते हैं ;  “खूबसूरत कमल फूल के तने एक स्वादिष्ट एवं मशहूर काश्मीरी व्यंजन ‘नादूर यखनी’ की मुख्य सामग्री होते हैं। पानी के अंदर मिलने वाले ये कमल फूल के रसीले तने उस शोरबे के स्वादों को बड़ी आसानी से सोख लेते हैं, जिसमें इनको पकाया जाता हैं...तदुपरांत इसका लाजवाब और मनभावन स्वाद का जिक्र अवर्णनीय हैं। “                     तो कहा जा सकता हैं कि कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि कमल फूल के तनों से इतनी बेहतरीन पकवान बनाई जा सकती हैं।   ...

मैंने हालातों को बद से बदतर बना लिया था...

            Note  No. ‘96’                 मुझे पता था कि मेरी मौजूदा हालत बेहद खराब थी...मैंने हालातों को बद से बदतर बना लिया था। मैं अच्छी तरह से समझता था कि ये सब मेरे लिए सही नहीं था, फिर भी मैं अनजानी बातों से बेहद परेशान था...मैं घुटता रहता था।...मैं अपने अतीत के पलों को याद करके दुःखी और हताश–निराश हुआ करता था...मैं आने वाले भविष्य के बारे में बेवजह के खयालातों को सोंचकर तकलीफ़ में जीता था। मैं अपने वर्तमान समय के प्रति पूरी ईमानदारी से जवाबदेह नहीं था...हालांकि मुझे भलीभांति विदित और इस महत्व को अच्छी तरह से जानता था कि जिंदगी और कुछ नहीं...बस वह पल या लम्हा हैं जो हम अभी जी रहें हैं और यही हमारा हैं...इसे हमें शिद्दत से जीना चाहिए।...पर मैं क्या कर सकता था...सबकुछ समझते हुए हुए भी तो नासमझ बनता जा रहा था और खुद का बहुत नुकसान करता जा रहा था।                     अत्यंत ह्वास के इस पड़ाव के बाद और बहुत कुछ खो जाने वा खत्म हो जाने के बाद भी आखिरकार मुझे...

बहुत सी चीजें एवं बातें होती हैं, जिनमें बहुत कुछ मूल्यवान निहित रहता हैं

                            Note No. ‘ 95 ’                                                  हम किसी से और कहां से भी प्रेरणा ले सकते हैं। फिर वो प्रेरणास्त्रोत कोई विद्वान या उसके विचार, किताब, फिल्म, कोई वस्तु, कोई बात, कोई आम इंसान, जीव–जंतु अथवा कोई और चीज़ हो...हम किसी से भी कुछ भी सीख सकते हैं...बस हममें इनसे सीखने की वो लगन और निपुणता होनी चाहिए कि हम इनसे क्या कुछ सीख सकते हैं। बहुत सी चीज़े एवं बातें ऐसी होती हैं, जिनमें हमारे लिए बहुत कुछ मूल्यवान निहित होता हैं...पर उस मूल्य को देख पाने या महसूस करने का गुण हर किसी में नहीं होता...कुछ लोग होते हैं, जिनमें वो विवेक होता हैं, जिसके दम पर वे निहित बहुमूल्य को सोख लेते हैं।                 प्रकृति ने विभिन्न वस्तुओं, जीवों घटनाओं एवं अन्यत्र तरीकों के माध्यम से बहुत कुछ उजागर अथवा व्याप्त किया हैं.....

मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...

                                     Note No. ‘94’              मैं समय वर्षों में खो चुका था...और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...अजीब है ना, इंसान कब कितना बेपरवाह और नाकाम हो जाता हैं, उसे पता भी नहीं चलता कि वो इस फेहरिस्त में कितना कुछ खो चुका हैं...भान विहीन होकर इंसान अपने किमती समय को बिना किसी महत्वपूर्ण क्रियाशीलता के व्यर्थ ही गवां देता हैं...वहां समझ का फेर खत्म हो जाता हैं और समय के बहुमूल्य पल अक्सर जाया हो जाते हैं।                                                                     मेरा शरीर और मन जवाब दे चुका था...तब तक मैंने खुद को अत्यधिक बेबस–लाचार बना लिया था...और आखिरकार मैं उस हाल में पहुंच चुका था, जहां से दोबारा उठ पाना लगभग असम्भव लग रहा था...मैं जूझने...

स्थितियां चाहे जैसी भी हो...सामंजस्य स्थापित कर लेना ही समझदारी हैं

                          Note No. ‘93’                            तारीख जून 02, 2018...इस वक्त तक मैं अपने पैतृक गांव नांदेड़ में रह रहा था...मेरा घर गली कूंचे में स्थित था और यहां का परिवेश मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था...फिर भी फिलहाल उस समय वहां रहना मेरी मजबूरी थी, तो रह रहा था। यहां रहते हुए मैं किसी भी तरह की सिविल सर्विस पाने के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था और साथ ही कुछ समय निकालकर लिखता भी था। जिस तरह मुझे विभिन्न विषयों पर तरह–तरह की किताबें पढ़ने का शौक था...वैसे ही ‘लेखन’ भी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा था...और तब मैं ताउम्र लिखने के बारे में भी सोंचा करता था।                      जैसा कि मेरे गांव के उस वक्त के मौजूदा माहौल में मुझे रहना कतई पसंद नहीं था...फिर भी हालातों के मुताबिक समझौता करके खुद को उसमें ढाल लेना ही एक समाधान था और फिर हालांकि स्थितियां चाहे जैसी भी हो, ...

हम हालातों को बद से बदतर और बेहतर से बेहतर बना सकते हैं...

                Note No.'92'     जिंदगी में कुछ भी एकसमान नहीं रहता...समय के साथ सबकुछ बदल जाता हैं...खुशी-नाखुशी, दर्द...सबकुछ! परिवर्तन सृष्टि का नियम हैं, जो सब चीजों और बातों पर लागू होता हैं। हम जो कल थे...वो आज नहीं हैं...फिर आगे ऐसे नहीं होंगे।...हालात बदलते देर नहीं लगती...हम ख़ुद अपने हालातों को बद से बदतर और बेहतर से बेहतर बना देते हैं। ये हमीं पर निर्भर करता हैं कि हम स्वयं को लेकर क्या सोंचते हैं या हम ख़ुद को कितना महत्व देते हैं या ख़ुद को कितना प्यार करते है!         एक तरफ हम उस राह पर भी चल सकते हैं, जहां हमारा वजूद एकदम मामूली, खोखला और नगण्य बनकर रह जाता हैं, तो दूसरी तरफ हम वो रास्ता भी चुन सकते हैं, जो हमें बड़ी उपलब्धियों की ओर ले जाता हैं तथा हमें एक प्रभावशाली इंसान बनाता हैं।...हमें पता होना चाहिए कि हम क्यों और कहां जा रहे हैं अथवा क्या हासिल करना चाहते हैं।...हमें जान लेना चाहिए कि हम जीवन में क्या चुनते हैं और क्या नहीं!                   ©SD. Ar...

‘अल्केमिस्ट, ’ उत्कृष्ट, रोमांचक और बेमिसाल कृति...

                            Note No. '91'              उस समय मैं ‘अल्केमिस्ट’ नाम की किताब का हिन्दी अनुवाद पढ़ रहा था...और हालांकि मुझे बचपन से ही किताबों से बहुत लगाव था।                   यह पुस्तक ब्राजील के लेखक ‘पाओलो कोएलो’ की विश्व प्रसिद्ध रचना हैं और मेरे हिसाब से भी यह एक उत्कृष्ट कृति हैं।...जैसा कि किताब के कवर पेज़ पर लिखा था कि दुनिया की कई प्रमुख भाषाओं में इस किताब का इसका अनुवाद हो चुका हैं...होना भी चाहिए...इतनी महान् रचना हर किसी को बखूबी पढ़ना चाहिए।                                    यह किताब अपने सपनों को साकार करने वाले एक साहसी गड़रीये लड़के की आकर्षक और रोमांचकारी कहानी हैं। वो अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिम्मत जुटाकर सफर पर निकल पड़ता हैं...इस सफ़र में उसे कुछ लोग मिले, जो उसकी मदद करते हैं।...उसे रास्ते में कईं ...

जिंदगी में कुछ लोग ऐसे मिले थे...

          Note No. '90'                   जिंदगी के सफर में मुझे कुछ लोग ऐसे मिले थे, जो हमेशा के लिए यादों में बसकर रह गए थे। फिर चाहे वे मेरे लिए अनजान ही क्यों ना थे, पर अपने खुले व्यवहार और जिंदादिली से उनमें गैरों को अपनी ओर खींच लेने का हुनर था, उनमें एक अलग ही आकर्षण होता था, जो हर किसी को बांध लेता था।... ऐसे लोग अनजाने होकर भी अपनों से थे...वो सच्चे हमदर्द थे...जिन्हें लोगों की तकलीफ का अहसास था।             विपरीत  कुछ लोग ऐसे भी मिले थे, जो पता नहीं दूसरों से सहज क्यों नहीं रहते थे... औरों के प्रति ना जाने किस किस तरह का घृणित व्यवहार अपनाते थे...वो अपने स्वार्थ तक सीमित रहते और और औरों के लिए हीन संकोची भावना रखते थे...वो कभी किसी से घुलमिलर  रहना पसंद नहीं करते थे। वो किसी के दुःख–दर्दों को कभी समझ नहीं पाते थे।...और ऐसे लोग हमारी खुशनुमा यादों के हिस्सा कभी नहीं बन सकते थे...वो स्वतः ही भुला दिए जाते थे !                ...

हम ही तय करते हैं कि हमें क्या बनना हैं...

Note  '89'                                        हम क्या बनेंगे... या बन सकते हैं...ये कौन तय करता हैं..? हम या प्रकृति..? बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी आज की स्थिति के लिए प्रकृति अथवा यूं कहें कि किस्मत नाम की किसी चीज को जिम्मेदार ठहराते हैं । क्या ये सही हैं..? पर मैं सोचता हूं नहीं...बिल्कुल नहीं..! हां प्रकृति हमारी राह में विभिन्न मुश्किल परिस्थितियां अवश्य पैदा करती हैं और हमारी ' नियति ' को पा लेने की महत्त्वाकांक्षी संकल्पना में भी उसका शक्तिशाली विरोधी हस्तक्षेप होता हैं, ताकि हम अपने लक्ष्य से भटक जाएं... उसका प्रयोजन सच्चे विजेता का चुनाव करना होता हैं ! पर प्रकृति हमें अपनी नियति को हासिल करने से रोक नहीं सकती, जबकि हमारे इरादे नेक और मजबूत हों।               और हां, तब भी, जबकि हमें बिल्कुल ये लगता हैं कि हमारे हाथ में कुछ भी नहीं हैं और हमारी जिंदगी अब परिस्थितियों के विभिन्न आयामों से तय होगी... तभी भी विपत्तिपूर्ण दौर के वशीभू...

चेतन–अवचेतन का अंधविश्वासी अंधकार

                          Note No. ' 88 '       काफी सारे लोग ऐसे भी थे, जो अपनी दैनिक जिंदगी में अत्यधिक नियम–पालन करते थे...चाहे वे नियम कायदे बेहूदा व्यर्थ हो...पर वो लोग इस बात से बेखबर होते थे । वे लोग अपने जीवन में काफ़ी फूंक फूंककर कदम कदम रखते थे...वे लोग अपने कामों को लेकर अति सजग किस्म का रवैया अपनाते थे...उन्हें हरदम ये डर लगा रहता था कि हमने ये काम उचित समय, निर्धारित विधि–रीति–रिवाज या निश्चित स्थिति में नहीं किया तो हमारे साथ कुछ अनिष्ट हो जायेगा...बहरहाल अनिष्ट का डर बहुत डराता हैं !...और इस प्रकार वे लोग अपने चेतन एवं अवचेतन मन में महा अंधकार युक्त तथा अति कष्टकारी अंधविश्वास को पैदा करके भयानक डर से डरते रहते थे ।               विभिन्न मिथ्या पहलुओं को अपने जीवन में शामिल करके लोग तरह तरह की बातों का ताना बाना बुनते रहते थे...जैसे किसी काम को करने या कहीं पर जाने की शुरुआत में यदि किसी को छींक आ जाए, तो लोग उस काम को थोड़ी देर बाद करते थे या कहीं जा रहे हो,...

इंसान खुद समस्या पैदा करता है...

                                Note    ' 87 '                                 बहुत से लोग सोचते हैं कि उनके साथ इतनी सारी समस्याएं क्यों हैं...मगर बहुत मौकों पर उनकी ये सोच वहम मात्र होती...वास्तव में अधिकांश समस्याएं इंसान खुद पैदा करता हैं...अर्थात् असल समस्या उसकी नकारात्मक सोंच से पनपती हैं...।               दरअसल व्यक्ति को ये वहम भी होता हैं कि उसकी समस्या बहुत बड़ी और कष्टकारी हैं...और इस फेहरिस्त में वो दूसरों की गंभीर समस्याओं को भी नजरअंदाज कर जाता हैं...वो औरों की अत्यधिक मजबूरियों को देख नहीं पाता !               इंसान अपनी समस्याओं को जितना बड़ा मानेगा वो उतना ही बड़ा रूप धारण कर लेगी और उसे बेबस–लाचार बनाकर उसे हारने पे मजबूर कर देगी...व्याधि के ऐसे मुश्किल हालातों में इंसान की हिम्मत का ना टूटना ही मायने रखता हैं...पर लोग अक्सर यह...

लोगों के अस्तित्व का खोखलापन...

                             " Note No. 86 "                मैं जिस माहौल में पैदा हुआ और जहां मेरा बचपन बीता, वहां मेरे गिर्द रहने वाले लोगों के व्यक्तित्व मुझे मुझे कभी सही नहीं लगे।                   और जहां तक मैंने महसूस किया था, उन लोगों में आपसी तालमेल, प्रेम व सहानुभूति की भावना का अभाव था... उनमें वो सहृदयता मुझे कभी किसी में नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थीं।...और कई लोग तो इतने शातिर माहिर थे कि खुद को अच्छा दिखाने का मिथ्या प्रदर्शन करते थे। जैसे–जैसे मैं कुछ और समझने लगा, वैसे–वैसे मैंने कईं ऐसे पहलुओं पर गौर किया जोकि लोगों के आचार–विचारों की भयावह हकीकत को बयां करते थे! लोगों में एक–दूसरे के प्रति ईर्ष्या द्वेष की भावनाएं कूट–कूट कर भरी पड़ी थी। वे एक दूसरे की उन्नति को देखना पसंद नहीं करते थे...हर कोई चाहता था कि सिर्फ वही आगे बढ़े, बाकि लोग उनसे पीछे ही रहे...दूसरे शब्दों में एक आलसी, नाकारा या दुष्चरित्र व्यक्ति...

मुझपर झूठे आरोप लगते देखा

                            "Note No. 85"              उस रात मैंने एक बुरा सपना देखा था...वो कुछ इस तरह था..., "मुझपर बेवजह के ईल्जाम थोपे जा रहे थे...सब लोग तरह तरह की बातें कर रहे थे...मैं आहत-शोकजदा–हैरान–परेशान था...आखिर क्यों ये लोग मुझपर मिथ्या दोषारोपण कर रहे थे।"           जिन्होंने मुझपर पर आरोप मढ़े थे...वो जानते थे कि मैंने कुछ गलत नहीं किया हैं, कुछ लोग वो थे जिन्हें कुछ पता नहीं था, पर वे आरोप लगाने वालों की बातें आंखें मूंदकर मान रहे थे और अपनी–अपनी मंशाएं रख रहे थे कि इस व्यक्ति ने ये जुर्म किया हैं या हो सकता हैं ना भी किया हो...ठीक से बता बता नहीं सकते। अंततः उनमें थोड़े लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मेरे व्यक्तित्व पर पूरा भरोसा था...वो इस बात को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे...वो हरगिज स्वीकार नहीं कर रहे थे कि मैं कुछ गलत कर सकता हूं...वे लोग मेरे हित में बातें कर रहे थे।           मैं ख़ामोश खड़ा इस मिथ्या आरोप के महाकष्टप्र...

मैं बहुत से काम करना चाहता था...

                      "Note No. 84"                      मैं कितने ही सारे काम करना चाहता था...बहुत अधिक व्यस्त रहना चाहता था...मैं काम में इतना अधिक व्यस्त रहना चाहता था कि चाहे कितना ही थककर चूर हो जाऊं, पर काम करता रहूं...मैं ठहरना नहीं चाहता था। मेरी ख्वाहिश थी कि मेरे पास करने के लिए सारे काम हो कि व्यर्थ की बातों के लिए मुझे ज़रा भी समय ना मिल सके।                          मैं अपने अतीत में व्यर्थ गवाएं हुए पलों की आगे आने वाले वक्त का सदुपयोग कर भरपाई  करना चाहता था। मैं वो सबकुछ करना चाहता था, जिससे दिल को सच्ची खुशी का अहसास हो...मेरे कामों से लोगों में प्यार और खुशहाली का प्रसार हो।                          मैं आज उन श्रेष्ठ कामों को अंजाम देना चाहता था, जिन्हें मैं किसी वजह से गुजर चुके वक्त में नहीं कर पाया था।       ...

मैं तब सोंचा करता था कि काश वो लम्हें फिर से लौट आए...

                        "Note No. 83"                      उस दिन मैं देर तक सोता रहा था...उठने से ठीक पहले तक मैंने एक छोटा सा ख्वाब देखा था...ख़्वाब कुछ यूं था कि...                                                                                                 मैं अपने किसी रिशतेदार के साथ अपने अंकल आंटी के घर जा रहा था...घर पहुंचने के बाद मैं अपनी आंटी के बड़े बेटे महेंद्र से बहुत सी बातें करने लगा...उस से कहने लगा कि मुझे उसकी सगाई वाले फोटो दिखाएं।...वो एल्बम लेके आता हैं और मुझे फ़ोटो दिखाने लगता हैं...फ़ोटो देख कर मैं उन दोनों की जोड़ी को लाज़वाब कहता हूं... कुछ देर में मां की आवाज़ सुनाई देती हैं...छोरा उठ! कब तक सोता रहेगा!...

ऐसा क्यों होता हैं !

                     "Note No. 82"       आखिरकार ऐसा क्यों होता हैं...जबकि सब कोई सच्चाई की बात करते हैं सिर्फ़, पर उसपर अमल कोई नहीं करता..! ऐसा क्यों होता हैं कि लोग दिखाते कुछ और हैं, जबकि उनका असल चेहरा बिल्कुल अलग होता हैं...दरिंदगी से भरा हुआ!                                                                                    स्कूल में सिखाने वाला शिक्षक बच्चों को नैतिक मूल्यों से ओत - प्रोत बातें सीखा सकता हैं, पर वास्तव में खुद अनैतिक हो सकता हैं।                                                                         ...

मेरे लेखन में बाधा

                        "Note No. 81"                  बड़ी आसानी से मैंने लिखना छोड़ दिया था...वो भी उन पलों में जब मुझे ऐसा कुछ लिखना था, जो वाकई लाजवाब हो...हां बिलकुल मेरे जेहन में उस वक्त कईं विचार मौजूद थे...! और हालांकि मैं अपने काव्य संग्रह "ममत्व मंजरी" एवं "शांत सागर" तथा गद्य में दबी आवाज डायरी को दो हिस्सों में तब तक पूरा कर चुका था। तत्पश्चात मैंने अपने महत्वाकांक्षी उपन्यास को लिखने की शुरुआत की थी पर शुरुआत में ही लेखन बाधा से मैं उसे पूरा न कर सका था!                     और आखिरकार काफ़ी लंबे अरसे बाद मैं फिर से लिखने को बेताब था...जुलाई 09, 2017 को मैंने फिर से लिखने की शुरुआत की थी।                                ©SD. Arya