Note No. ' 88 '
काफी सारे लोग ऐसे भी थे, जो अपनी दैनिक जिंदगी में अत्यधिक नियम–पालन करते थे...चाहे वे नियम कायदे बेहूदा व्यर्थ हो...पर वो लोग इस बात से बेखबर होते थे । वे लोग अपने जीवन में काफ़ी फूंक फूंककर कदम कदम रखते थे...वे लोग अपने कामों को लेकर अति सजग किस्म का रवैया अपनाते थे...उन्हें हरदम ये डर लगा रहता था कि हमने ये काम उचित समय, निर्धारित विधि–रीति–रिवाज या निश्चित स्थिति में नहीं किया तो हमारे साथ कुछ अनिष्ट हो जायेगा...बहरहाल अनिष्ट का डर बहुत डराता हैं !...और इस प्रकार वे लोग अपने चेतन एवं अवचेतन मन में महा अंधकार युक्त तथा अति कष्टकारी अंधविश्वास को पैदा करके भयानक डर से डरते रहते थे ।
विभिन्न मिथ्या पहलुओं को अपने जीवन में शामिल करके लोग तरह तरह की बातों का ताना बाना बुनते रहते थे...जैसे किसी काम को करने या कहीं पर जाने की शुरुआत में यदि किसी को छींक आ जाए, तो लोग उस काम को थोड़ी देर बाद करते थे या कहीं जा रहे हो, तो थोड़ा रुककर पश्चात चलते थे।... और कुछ लोग अपने स्ममुख चलित स्थिति में यदि कोई बिल्ली रास्ता काट कर गुजर जाए तो इस घटना को अशुभ मानते थे और तुनुक लगाते थे या डरते थे कुछ गलत ना हो जाए...कुछ लोगों को अपने और पड़ोसियों के घरों के छज्जों तथा पास खड़े पेड़ों पर बैठे कौवों की कांव कांव भी परेशान करती थी।
लोग डर के मारे विभिन्न देवी देवताओं के नाम से दिखावे स्वरूप उपवास–व्रत करते थे और अपने लिए सुखी जीवन की चाह में विभिन्न मंदिरों में भटकते हुए निरर्थक मिन्नतें का प्रदर्शन किया करते थे।
अंततः आखिरकार इस तरह के लोगों को महामूढ़ कहा जा सकता हैं, जिन्हें यथार्थता का भान नहीं होता...और इस श्रेणी में अत्यधिक शिक्षा प्राप्त और समाज में ख्याति प्राप्त विद्वान भी शामिल हो सकते हैं...क्योंकि अज्ञान से भरपूर महाकष्टकारी...गहन अंधकारयुक्त "अंधविश्वास" अपने वृहद भयावह रूप से एक असरकारक जाल बुनता हैं, जिसमें हर कोई फंस जाता हैं और फिर कभी निकल ही नहीं पाता या कभी निकलना ही नहीं चाहता हैं...यह बड़ी त्रासदी हैं।
कदाचित किंचित श्रेष्ठतम व्यक्तित्व वाले चरित्रवान लोगों को ये अंधविश्वास रूपी मायाजाल जरा भी नहीं डिगा सकता !!
©SD. Arya

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