सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...

                                    Note No. ‘94’ 




            मैं समय वर्षों में खो चुका था...और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था...अजीब है ना, इंसान कब कितना बेपरवाह और नाकाम हो जाता हैं, उसे पता भी नहीं चलता कि वो इस फेहरिस्त में कितना कुछ खो चुका हैं...भान विहीन होकर इंसान अपने किमती समय को बिना किसी महत्वपूर्ण क्रियाशीलता के व्यर्थ ही गवां देता हैं...वहां समझ का फेर खत्म हो जाता हैं और समय के बहुमूल्य पल अक्सर जाया हो जाते हैं।                                                                    मेरा शरीर और मन जवाब दे चुका था...तब तक मैंने खुद को अत्यधिक बेबस–लाचार बना लिया था...और आखिरकार मैं उस हाल में पहुंच चुका था, जहां से दोबारा उठ पाना लगभग असम्भव लग रहा था...मैं जूझने के लायक नहीं बचा था। मेरा मनोबल टूट चुका था और मेरा शरीर तेज़ी से कमज़ोर पड़ता जा रहा था, जबकि उसके कुछ वक्त पहले तक मैं अपने सुदृढ़ शरीर बनाने की कल्पना किया करता था, लेकिन उस वक्त मुझे बेहद कमजोरी महसूस होने लगी थी... भयंकर चिंताएं मुझे अंदर ही अंदर खोखला बना रही थी...मैं अत्यधिक तनाव के दबाव से दबता जा रहा था...मैं दिन पर दिन क्षीण, शक्तिहीन होता जा रहा था...मुझमें स्फूर्ति नहीं बची थी और मैं खुद को निहायत ऊर्जाहीन महसूस करने लगा था। मैं इतना बदहाल हो चुका था कि उस हाल से ऊबर पाना मेरे बस का नहीं रह गया था...वापसी कर पाना मेरे लिए लगभग मुश्किल था ।                                                                         और इतना सबकुछ होने के बावजूद मेरे अंदर एक विचार था, जो मुझे हरदम प्रेरित करता था और अपने जीवन के प्रति जवाबदेह होने की याद दिलाता था...वो विचार ही था, जो मुझे कठिन से कठिन दौर में भी आशावाद से भरपूर कर देता था।...वो विचार ही मुझे जीने की नई राह दिखाता और हरपल मुझे ये महसूस कराता था कि मेरे वजूद के अभी कईं मायने बचे हैं और मुझे बहुत से काम करने हैं ! अंततः मुझे पता था कि...अब मुझे क्या करना था...मुझे अत्यधिक चुनौतियों का सामना करना था...मुझे फिर से नई ऊर्जा के साथ खड़ा होना था, मुझे अपने इरादों को फौलादी बनाना था...मुझे अथक मेहनत करके वास्तविक संघर्ष की आग में तपना था...ताकि मैं अपना शुद्धतम रूप पा सकूं ! आखिरकार...मैं खुद को साबित किये बिना कैसे रह सकता था !                                                                                         

                                 ©SD. Arya 

  


         

टिप्पणियाँ