" Note No. 86 "
मैं जिस माहौल में पैदा हुआ और जहां मेरा बचपन बीता, वहां मेरे गिर्द रहने वाले लोगों के व्यक्तित्व मुझे मुझे कभी सही नहीं लगे।
और जहां तक मैंने महसूस किया था, उन लोगों में आपसी तालमेल, प्रेम व सहानुभूति की भावना का अभाव था... उनमें वो सहृदयता मुझे कभी किसी में नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थीं।...और कई लोग तो इतने शातिर माहिर थे कि खुद को अच्छा दिखाने का मिथ्या प्रदर्शन करते थे। जैसे–जैसे मैं कुछ और समझने लगा, वैसे–वैसे मैंने कईं ऐसे पहलुओं पर गौर किया जोकि लोगों के आचार–विचारों की भयावह हकीकत को बयां करते थे! लोगों में एक–दूसरे के प्रति ईर्ष्या द्वेष की भावनाएं कूट–कूट कर भरी पड़ी थी। वे एक दूसरे की उन्नति को देखना पसंद नहीं करते थे...हर कोई चाहता था कि सिर्फ वही आगे बढ़े, बाकि लोग उनसे पीछे ही रहे...दूसरे शब्दों में एक आलसी, नाकारा या दुष्चरित्र व्यक्ति अन्यत्र लोगों की अच्छी स्थिति या उनके अच्छे आचरण को देखना पसंद नहीं करता था !...ये लोग अपने मतलब को साधने के लिए किसी का गलत तरीके से इस्तेमाल करने से भी नहीं कतराते थे।
और भी कई सारी वाहियात बातें थीं, जो लोगों में मैंने देखी थी, जो उनके अस्तित्व के खोखलेपन का चित्र स्पष्ट करती थी...लोगों के ये रूप भयावह होते थे । मैं बचपन में इस बारे में सोचा करता था कि लोग इस तरह के क्यों होते हैं और ऐसे चरित्र के साथ कैसे जी लेते हैं। मैं अक्सर जुदा–जुदा किस्म के लोगों में श्रेष्ठ स्वभाव के निहीत समाहित होने की दिली तमन्ना रखता था...पर अफ़सोस ! लोग वैसे हरगिज नहीं हो सकते थे।...लोग इस बात को महसूस क्यों नहीं कर पाते थे कि, जिंदगी, "परमेश्वर" की अनुपम–अनमोल–उत्कृष्ट–महान कृति हैं, जो इंसान को सच्चे मायनों में श्रेष्ठ छवि के साथ श्रेष्ठतम कार्यों को पूरी निष्ठा से पूर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध करती हैं ।
जिंदगी में हालात चाहे, जो और जैसे पैदा हो जाए... उन हालातों में विचलित ना होकर मजबूती के साथ सच्चाई की राह पर अग्रसर होना ही इंसानियत का परचम हैं...विध्वंश विरोधाभासों में अपनी विशुद्ध छवि की अद्वितीय छाप ही सच्चे इंसान की पहचान हैं ।
©SD. Arya

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