Note No. ‘98’
हमारे बचपन की बहुत सी बातें हमें याद नहीं रहती...फिर भी कुछ बातें, घटनाएं और लोग हमें याद रहते हैं...हम उन्हें भुलाए नहीं भूल सकते।...कुछ लोग यादों में जिंदा थे, जिन्होंने बचपन में मुझे प्यार दिया था...मेरे कुछ संगी साथी भी आजतलक अच्छे से याद थे, जिनके साथ मैंने खूब मस्तियां की थी और बहुत खेल खेले थे। बात तब की हैं, जब मेरे दूध के दांत गिर रहे थे। मुझे अपने दूध के दांतों का टूटना अच्छे से याद था...जब मेरा कोई दांत गिरने वाला होता था, तो मैं उसे अपनी जीभ से इधर–उधर हिलाता, दूसरे दांतों से उसपर दबाव बनाता था...और इस प्रक्रिया में उत्पन्न हुए दर्द से मुझे बेहद सुकून मिलता था। उस वक्त मेरे माता–पिता मेरी दीदी और मुझे लेकर आर्यसमाज संस्था उज्जैन में रहते थे। मेरा एडमिशन नजदीकी निजी प्राइमरी स्कूल में करवाया था, जहां स्कूल के आसपास बारिश के दिनों में काफ़ी गंदगी हुआ करती थी...वहां सुअर भी बहुत रहते थे। हम आर्यसमाज केम्पस के अन्दर रहते थे और केम्पस के आसपास कईं गरीब लोगों की बस्तियां थी और उसी बस्ती में दुर्गा नाम की एक लड़की रहती थी...मुझे अब भी उसका नाम याद था, वो लगभग मेरी ही उम्र की थी।...उस से ना जाने क्यों मुझे ईर्ष्या होती थीं...वो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थी। मैं और बस्ती के सभी लड़के–लड़कियां वहां मौजूद नीम के बहुत बड़े पेड़ के नीचे खेला करते थे...मेरे ना चाहते हुए भी दुर्गा हमेशा हमारे साथ होती थी, पर उसका साथ होना मुझे कभी अच्छा नहीं लगता था...मैं उससे मन ही मन नफरत करता था...अब उससे मुझे ये नफरत क्यों और कैसे हुई थी तब मैं नहीं जानता था। कई बार दुर्गा मेरे घर आ जाती थी, तो मां उसे खाने पीने की चीजें देती थी। मैं उससे बहुत बार मां द्वारा दी गई चीजें छुड़ा लिया करता था और कई बार उसे कुछ भी ना देने के लिए जिद करता था।...मुझे बखूबी याद हैं मेरे अंदर उसके प्रति बहुत दुर्भावना थी...मैं कभी उसे अपनी तरफ से कोई चीज नहीं देता था और ना ही उसके लिए किसी तरह की कोई हमदर्दी रखता था। दुर्गा को मेरी बहन, मां और बाबूजी अच्छे से रखते थे, पर मैं उसे जरा भी बर्दाश्त नहीं करता था...मैंने कई बार उसे अपने घर से भगाया था...और वो बेचारी मुझे बिना कुछ कहे चुपचाप चली जाती थीं। ऐसा लगता था, उसे मेरी कही बातों का कोई असर नहीं होता था ना ही उसे बुरा लगता था...और वो थोड़ी देर में ही फिर से हमारे पास आ जाती थी। कभी ऐसा भी होता था कि उसे मां और दीदी का सपोर्ट मिल जाने पर वो मुझपर थोड़ी हावी हो जाती थी और मुझे चिढ़ाती थी। इस तरह मैंने उस लड़की को बहुत परेशान किया था...उसे मैं कभी पसंद नहीं करता था, जबकि दुर्गा ने कभी मुझसे कोई शिकायत नहीं की...मेरे द्वारा उसको इतना परेशान करने के बावजूद वो कभी विरोध नहीं करती थी...उसे इस बात का जरा भी अफसोस या मलाल नहीं होता था...और मेरे ऐसे भेदभाव भरे रवैैैये के बावजूद मुझसे हर बार आगे रहकर बातें करती थी...मेरे आसपास रहती थी। सबकुछ एक सा कहां रहता हैं...समय के साथ हरेक चीज बदल जाती हैं...बहुत कुछ बदलने लगता हैं...मुझमें भी बदलाव होने लगा था।...और कुछ समय गुजरने के बाद एक वक्त ऐसा भी आया, बच्चों की बीच सिर्फ दुर्गा का साथ होना पसंद आने लगा था। कोई तो बात थी, जो मुझे उसका साथ पाने को मजबूर कर रही थी।अब मुझे उसके साथ खेलना और उस से बात करना अच्छा लगने लगा था। अब जब वो मुझे कभी कुछ समय तक दिखाई नहीं देती, तो मैं परेशान हो जाता था...अब उसके बिना मुझे अच्छा नहीं लगता था। अब मैं अपनी खाने की चीजें मिल–बांटकर खाता और अपने खेल–खिलौने भी उस से साझा कर खेलता था...जब कभी वो पास नहीं होती तो मैं उसके बिना उदास हो जाता और अच्छा महसूस नहीं करता था।...गजब जादू था...। जिस लड़की से मैं इतनी नफरत करता था आज उसे बेेेेेतहाशा पसंद करने लगा था। और सालों गुजर जाने के बाद भी वो अबतलक मेरी यादों में जिंदा थी।...मुझे याद हैं जब मेरे माता–पिता आर्यसमाज को छोड़कर गाांव आकर रहने लगे थे...और अब मैं कक्षा 6 में प्रवेश ले चुका था...मेरा चयन उज्जैन शहर के ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय में हुआ था, तब मैं उससे दोबारा आर्यसमाज संस्था में सिर्फ और सिर्फ दुर्गा से ही मिलने गया था।...अब वहां बहुत कुछ बदल चुका था...कैम्पस की पुरानी बिल्डिंग की जगह अब नई ईमारत बन चुकी थी। मैं वहां मौजूद लोगों और बच्चों से मिला उनसे बातें की और उनसे दुर्गा के बारे में पूछा...पश्चात कोई बच्चे जाके वहां दुर्गा को जल्द ही बुला लाए।...जब वो मेरे सामने आई तो मैं उसे देखता ही रह गया था...अब मैं कुछ बड़ा और शायद थोड़ा समझदार हो गया था...अब मैं वो बच्चा नहीं रहा था , जिसके दूध के दांत गिर रहे थे...मैं उसकी सुंदरता को अच्छे से महसूस कर सकता था...वाकई वो बहुत खूबसूरत लग रही थी। हम दोनों ने संकोचवश कुछ बातें की। वो थोड़ी शर्मीली और कमाल की लग रही थी। मैंने उससे पूछा था...‘कैसी हो’ ! जवाब में उसने कहा था ‘अच्छी हूं’ और उसने मुझसे भी पूछा था तुम कैसे हो और मैंने जवाब में ‘ठीक हूं’ कहा होगा। और फिर वहां मौजूद लोगों और दुर्गा से विदा लेकर मैं अपने ‘हॉस्टल’ में लौट आया था।...और उस दिन मैं पूरी रात नहीं सो पाया था...पर मैं क्या कर सकता था..!...शायद कुछ भी तो नहीं..!
©SD. Arya

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