हम क्या बनेंगे... या बन सकते हैं...ये कौन तय करता हैं..? हम या प्रकृति..? बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी आज की स्थिति के लिए प्रकृति अथवा यूं कहें कि किस्मत नाम की किसी चीज को जिम्मेदार ठहराते हैं । क्या ये सही हैं..? पर मैं सोचता हूं नहीं...बिल्कुल नहीं..! हां प्रकृति हमारी राह में विभिन्न मुश्किल परिस्थितियां अवश्य पैदा करती हैं और हमारी ' नियति ' को पा लेने की महत्त्वाकांक्षी संकल्पना में भी उसका शक्तिशाली विरोधी हस्तक्षेप होता हैं, ताकि हम अपने लक्ष्य से भटक जाएं... उसका प्रयोजन सच्चे विजेता का चुनाव करना होता हैं ! पर प्रकृति हमें अपनी नियति को हासिल करने से रोक नहीं सकती, जबकि हमारे इरादे नेक और मजबूत हों।
और हां, तब भी, जबकि हमें बिल्कुल ये लगता हैं कि हमारे हाथ में कुछ भी नहीं हैं और हमारी जिंदगी अब परिस्थितियों के विभिन्न आयामों से तय होगी... तभी भी विपत्तिपूर्ण दौर के वशीभूत होने के बावजूद भी इंसान को इसी बात पर दृढ़ संकल्पित रहना चाहिए कि, जो कुछ भी वो सच्चे अर्थों में चाहता हैं वो उसे चाहे देर से मिले पर मिलता जरुर हैं।
हमारे खूबसूरत ख़्वाब अवश्य पूरे होते हैं...और हम ही ये तय करते हैं कि आखिरकार हमें क्या बनना हैं..!
©SD. Arya

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