Note No. ‘93’
तारीख जून 02, 2018...इस वक्त तक मैं अपने पैतृक गांव नांदेड़ में रह रहा था...मेरा घर गली कूंचे में स्थित था और यहां का परिवेश मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था...फिर भी फिलहाल उस समय वहां रहना मेरी मजबूरी थी, तो रह रहा था। यहां रहते हुए मैं किसी भी तरह की सिविल सर्विस पाने के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था और साथ ही कुछ समय निकालकर लिखता भी था। जिस तरह मुझे विभिन्न विषयों पर तरह–तरह की किताबें पढ़ने का शौक था...वैसे ही ‘लेखन’ भी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा था...और तब मैं ताउम्र लिखने के बारे में भी सोंचा करता था।
जैसा कि मेरे गांव के उस वक्त के मौजूदा माहौल में मुझे रहना कतई पसंद नहीं था...फिर भी हालातों के मुताबिक समझौता करके खुद को उसमें ढाल लेना ही एक समाधान था और फिर हालांकि स्थितियां चाहे जैसी भी हो, सामंजस्य स्थापित कर लेना ही समझदारी थी।
और...जबकि मैं अपने गांव में था...और यहां के वातावरण एवं मेरी अभावों से भरी मामूली–सी जिंदगी के चलते, फिलहाल उस समय मेरे पास लिखने के लिए ऐसी कोई बेहतरीन या खुशनुमा यादें नहीं थी, जिन्हें मैं अपनी ‘डायरी’ में सहेजकर रख सकूं...लेकिन फिर भी जो और जैसे भी लम्हें या विचार मेरे हिस्से आए थे...मैं उन्हें संजोकर रख लेना चाहता था...और ये सब मुझे ख़ुशी का अहसास कराता था।
©SD. Arya

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