सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अक्टूबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तुम कौन हो?, इसके स्थितिवश कईं अर्थ निकलते हैं!

                          ' Note No. ' 69 ' .                                                                                                              तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कोई तुम्हारे बारे में क्या सोचता हैं, पर तकलीफ तो तब होती हैं और बहुत होती हैं, जब वो शख्स जो तुम्हें बहुत अच्छे से जानता हैं, तुम्हारी अच्छाइयों को समझता हैं और फिर अचानक से वही आके तुमसे कहता हैं कि तुम गलत हो! दोषारोपित करते हुए वह कहता हैं कि तुम कौन हो!?, तुम्हारा वजूद ही क्या हैं!?...ये उस इंसान के लिए असहनीय और अत्यंत पीड़ादायक होता हैं, स्वतः ही वो अनादर के संतापी घूँट को पीता हैं, जो हलक में ही अटक कर रह जाता हैं और शूल की मानिंद कण्ठ में चुभता हैं।...और...त...

वैसे चाहो तो तुम किसी के सपनों पर हँस सकते हो...और बेमतलब उसके लिए जरा रुक सकते हो....

                    Note No. '68'               देने का सुख दाता को परम आनंद प्रदान करता हैं... वैसा सुख नहीं जिसमें कि किसी को कुछ देकर संसार में प्रसिद्धि पाने का स्वार्थ लक्षित होता हैं, अपितु ऐसा आनंद, जो देने वाले को बिना किसी स्वार्थ के किसी जरूरतमंद की वास्तविक मदद के उपरांत मिलता हैं...अगाध-अटूट और पवित्र प्रेम भी ऐसी धारा में प्रवाहित होता हैं...अशुद्धि अथवा अपूर्णता से विहीन...हमेशा पाक-साफ!                                                            लोगों के पास किसी न किसी के लिए कुछ ना कुछ देने के लिए अवश्य ही होता हैं...मगर कभी-कभी कोई ऐसा भी होता हैं, जिसके पास किसी को देने के लिए कभी कुछ नहीं होता... खुशी, वक्त, दोस्ती और प्यार...शायद कुछ भी नहीं!...बहरहाल वो अपनी नियति को पाने की कोशिश में अनवरत लगा रहता हैं...वैसे चाहो तो तुम ऐसे शख्स के स...