"Note No. 85"
उस रात मैंने एक बुरा सपना देखा था...वो कुछ इस तरह था..., "मुझपर बेवजह के ईल्जाम थोपे जा रहे थे...सब लोग तरह तरह की बातें कर रहे थे...मैं आहत-शोकजदा–हैरान–परेशान था...आखिर क्यों ये लोग मुझपर मिथ्या दोषारोपण कर रहे थे।"
जिन्होंने मुझपर पर आरोप मढ़े थे...वो जानते थे कि मैंने कुछ गलत नहीं किया हैं, कुछ लोग वो थे जिन्हें कुछ पता नहीं था, पर वे आरोप लगाने वालों की बातें आंखें मूंदकर मान रहे थे और अपनी–अपनी मंशाएं रख रहे थे कि इस व्यक्ति ने ये जुर्म किया हैं या हो सकता हैं ना भी किया हो...ठीक से बता बता नहीं सकते। अंततः उनमें थोड़े लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मेरे व्यक्तित्व पर पूरा भरोसा था...वो इस बात को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे...वो हरगिज स्वीकार नहीं कर रहे थे कि मैं कुछ गलत कर सकता हूं...वे लोग मेरे हित में बातें कर रहे थे।
मैं ख़ामोश खड़ा इस मिथ्या आरोप के महाकष्टप्रद और असहनीय दर्द को चुपचाप सह रहा था...और तब मैंने अपने बचाव में किसी से कुछ भी नहीं बोला था..!
©SD. Arya

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