"Note No. 82"
आखिरकार ऐसा क्यों होता हैं...जबकि सब कोई सच्चाई की बात करते हैं सिर्फ़, पर उसपर अमल कोई नहीं करता..! ऐसा क्यों होता हैं कि लोग दिखाते कुछ और हैं, जबकि उनका असल चेहरा बिल्कुल अलग होता हैं...दरिंदगी से भरा हुआ! स्कूल में सिखाने वाला शिक्षक बच्चों को नैतिक मूल्यों से ओत - प्रोत बातें सीखा सकता हैं, पर वास्तव में खुद अनैतिक हो सकता हैं। हर कोई अपना स्वार्थ पूरा करने में लगा रहता हैं और इतना अंधा हो जाता हैं कि स्वार्थपूर्ति हेतु कईयों का अहित भी कर जाता हैं। हर व्यक्ति को मददगार होना चाहिए...पर ऐसा कहां होता हैं..! बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं, जो मदद के लिए आगे आते हैं। इंसान दिन प्रतिदिन नैतिक पतन की ओर जा रहा हैं...वह अपनी आत्मा और शरीर को अपवित्र और दोषयुक्त करता जा रहा हैं...पर इसका उसे जरा भी अफ़सोस-मलाल नहीं...जरा भी अहसास नहीं...यह बड़ी त्रासदी हैं..! कम से कम चरित्र का ये अक्षम्य ह्वास तो कभी नहीं होना चाहिए।...जमाने के इस दुष्चरित्र को देख मैं अत्यधिक व्याकुल, क्षोभित, शोकसंतप्त, हैरान-परेशान हूं!
©SD. Arya

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें