सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

58. वो चले जाते है, मगर पीछे कितनी ही निशानियां छोड़ जाते हैं, जो कितने ही संकेतों और अर्थों को उत्पन्न करती हैं!!

            

                  Note No. '58'

             

          

               जो लोग सच्चे दिल से हमें चाहते हैं, हमारी परवाह करते हैं, असल में वही हमारे अपने होते हैं, बाकी सब दिखावा हैं...छलावा हैं!...वास्तव में वो हमारे बारे में जो कुछ सोंचते हैं, करते हैं अथवा हमारे लिए जो कुछ कहते हैं, उसके सच में बहुत मायने होते हैं। कभी महसूस करके देखो, हमारे लिए उनके द्वारा कही गई बातों में गहरे अर्थ और हमारे हित निहित होते हैं...पर कईं मर्तबा हम ऐसी अर्थपूर्ण और हितकारी बातों से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते हैं और ना ही उनके अर्थों को समझ वा महसूस ही कर पाते हैं, पर ऐसा नहीं होना चाहिए...वक्त रहते ऐसी चीजों को समझ लेना चाहिए...हमारे प्रति उनकी सहानुभूति, प्रेम, वफ़ा अथवा आत्मीय भावों की कद्र कर लेनी चाहिए...नहीं तो फिर अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं बचता...ऐसा अफ़सोस जो हमें सालता रहता हैं...हमेशा-हमेशा!!                                                                                        ...और कभी-कभी ऐसी बातों के अर्थ, लोगों को तब समझ में आते हैं, जब उन्हें ऐसी बातों को बोलने या कहने वाले उनके साथ नहीं होते...वो हमेशा के लिये उन्हें छोड़कर जा चुके होते हैं...तत्पश्चात वो सबकुछ साबित कर जाते हैं!                                                                                      आख़िरकार फिर हमें उम्रभर के लिए उनकी कमी महसूस होती हैं, उनके दृढ़ अस्तित्व की क्षति हमारे लिए किसी आघात से कम नहीं होती हैं...पश्चात हम असहनीय दर्द में डूब जाते हैं, हमारी हालत विषादी और रंजीदा-सी हो जाती हैं!...और तब हम उन्हें याद करने के अलावा क्या ही कर सकते हैं, जितनी दफ़ा उनकी याद आती हैं, हममें उनके प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता हैं...हम उनकी तमाम अच्छी बातों के लिए मन ही मन उनका शुक्रिया अदा करते हैं।                                                         

              ...वो चले जाते हैं, मगर पीछे कितनी ही निशानियां छोड़ जाते हैं, जो कितने ही संकेतों और अर्थों को उत्पन्न करती हैं...अफ़सोस! हमेशा की तरह कितनी ही बातें अधूरी रह जाती हैं, कितने ही किस्से छूट जाते हैं...और जाने वाले बस चले जाते हैं!!                                                                                   

                                                 ©SD. Arya
            






         

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक शिक्षक, जिसने जीवन पढ़ाया !

                                                Note No. '42'                                अपने गाँव से कक्षा पाँचवीं (जिला बोर्ड) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरा चयन संभाग स्तरीय शासकीय प्रतिभावान आवासीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, उज्जैन में हुआ। यह चयन मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़ था—एक ऐसा मोड़, जहाँ उत्साह से अधिक अनजानी आशंकाएँ मेरा इंतज़ार कर रही थीं। जब मैं पहली बार उस विद्यालय परिसर में पहुँचा, तो सबकुछ अपरिचित और कुछ हद तक वियोजित-सा लगा। नया स्कूल, नए शिक्षक, नए चेहरे और एक बिल्कुल अलग वातावरण—मानो मैं अपने परिचित संसार से अचानक बहुत दूर आ गया हूँ। मुझे वहाँ छोड़ने मेरे बड़े भाई आए थे। जब तक वे मेरे साथ रहे, तब तक मैं स्वयं को संभाले रहा; लेकिन जैसे ही वे लौटे, मेरे भीतर का साहस जैसे उनके साथ ही चला गया। उस रात मैं सो नहीं पाया। मैंने तकिए को अपने चेहरे से सटा लिया और चुपच...

🪷स्मृतियों में जीवित एक गुरू🪷

                                     “Note No. 111”             डॉ. खत्री सर का मैं अत्यंत प्रिय शिष्य था। चूंकि मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई को अस्त-व्यस्त कर लिया था, इस कारण एक बार उन्होंने आक्रोश में मुझे कठोर दंड दिया। उससे पूर्व उन्होंने किसी भी कारण मुझे कभी नहीं पीटा था—क्योंकि मैंने कभी उन्हें वैसा अवसर ही नहीं दिया था। पर वह प्रहार क्रोध का नहीं, असीम स्नेह का परिणाम था। वह दंड एक ऐसे गुरु का उत्तरदायित्व था, जो अपने प्रिय शिष्य को पतन की ओर जाते देखकर मौन नहीं रह सकता। वह दंड साधारण नहीं था—वह शिष्य के लिए संजीवनी बूटी था, जीवनदायी, चेतना जगाने वाला। डॉ. जी.डी. खत्री जैसे शिक्षक सदियों में विरले ही जन्म लेते हैं। ऐसे व्यक्तित्व किसी कालखंड की संपत्ति नहीं होते, वे युग की चेतना बन जाते हैं—इसीलिए उन्हें हम सदी के महानायक कहते हैं। उनका व्यक्तित्व असाधारण था, गरिमा और करुणा का अद्भुत संगम। वे लाजवाब थे। और यह मेरा ही दुर्भाग्य रहा कि मैं उनके उत्तम व्यक्तित्व ...

मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता

                     Note No. “108”                          यह एक गहरी और भावनात्मक भावना से भरी हुई विचारधारा का वर्णन हैं...सच्ची मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता, और अगर विकल्प हुआ, तो फिर वो मोहब्बत ही नहीं हैं, छलावा हैं...फिर चाहे वे जिंदगी भर मिले या ना मिले, इस बात से क्या फ़र्क पड़ता हैं !...वास्तव में उसी एक की खातिर बेलाग खुशियों का त्याग करके ताउम्र उसके इंतजार में जिंदगी तमाम ख़ाक कर ली जाती हैं...पर अन्यथा नहीं हुआ जाता !...जिसे हम बेतहाशा चाहते हैं वो अंशगत हो जाता हैं, हममें समाहित हो जाता हैं ! अंततः उसके ना लौटने अथवा उसको फिर कभी ना पाने की नाउम्मीदी में भी किसी और का नहीं हुआ जा सकता, तथापि जिंदगी तन्हाई में बिताकर ताउम्र प्यार की वफ़ा और शुचिता को अखण्ड रखा जाता हैं।                                             प्रेम अपने प्रियतम के प्...