"Note No. 59"
बहुत बार मैं लोगों के सवालों का समुचित और सुव्यवस्थित जवाब देता था...निष्ठा और विश्वास के साथ लगभग एक संतुष्ट जवाब, पर बहुत बार मेरे पास लोगों के छोटे-छोटे और आसान-से सवालों के जवाब भी नहीं होते थे और कभी जवाब होते भी, तो कुछ सवालों के जवाब देना मुझे कभी सही नहीं लगता था...बातें बहुत हैं!
विभिन्न लोगों के विभिन्न सवाल होते थे...और मैं बस चुप हो जाता था, तब मैं जवाबों के घेरों से मुक्ति चाहता था...उस वक्त मैं किसी को कुछ नहीं कहना चाहता था...वास्तव में, मैं अपने मौन की सीमाओं को कदापि नहीं तोड़ना चाहता था...और ऐसे में यही एकमात्र उपाय था।
कितना अजीब हैं, अक्सर लोग अजीब से सवाल और अनर्गल बातें करते थे, अपनी ही सुनाते थे, प्रश्नचिह्न लगाते थे और कभी-कभी आरोप-प्रत्यारोप भी...और ये सब स्वतः ही अफ़सोस और दर्द दे जाते थे।...सुनाते सब थे, पर सुनना कोई नहीं चाहता था...कोई नहीं चाहता था कि आखिर तुम क्या चाहते हो, अथवा तुम्हारे विचार व इरादे क्या हैं!...इतना सबकुछ होने पर मायूसी, दुःख और गम का आविर्भाव होना लाजिमी था, और तब जिंदगी ज़र्रों में विखंडित होके बेहद तकलीफ़ का अहसास कराती थी!
©SD. Arya
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