'' Note -73 "
गुरुजनों और अन्य लोगों से अर्जित ज्ञान महत्वपूर्ण तो होता हैं, परंतु तदुपरान्त सर्वोच्च-वास्तविक ज्ञान आत्मचिंतन और भीतर के अवचेतन को समझने से ही प्राप्त होता हैं...स्वयं का साफ-स्वछंद अध्ययन-विश्लेषण व्यक्ति को महानता की ओर अग्रसर करता हैं…वैसे भी इंसान को खुद का विशुद्ध मंथन करते रहना चाहिए। बहरहाल हम किसी से कुछ भी सीख सकते हैं, लेकिन हम स्वायत्तता से अपने अंदर के ज्ञान, विवेक, चेतना और बुद्धि का उपयोग करके भी सत्यार्थ ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं...वस्तुतः हम खुद में प्रज्ञा-प्रखरित कर सकते हैं। ऐसा तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि हम बिना सोंचे समझे ही व्यर्थ-अनर्थपूर्ण बातों में शामिल हो जाए या उनका अनुसरण करने लगे...अधिकांशतः लोगों में ये बात आम रहती हैं कि वे विभिन्न स्रोतों से मिल रहे ज्ञान अथवा जानकारी को आँखें मूंदे अपना लेते हैं, फिर चाहे वो स्त्रोत कैसा भी हो, वो ज्ञान कैसा भी हो, इससे उनको कहाँ फर्क पड़ता हैं, जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, उन्हें इस प्रसारित ज्ञान के प्रमाण ढूंढने चाहिए...उसकी जाँच पड़ताल करनी चाहिए और खुद से उसे अंकित-निर्दिष्ट करना चाहिए, पश्चात निष्कर्ष निकालना चाहिए कि प्राप्त ज्ञान सच हैं या झूठ तथा उसके हमारे लिए क्या मायने हैं...अफ़सोस ऐसा अक्सर होता ही कहाँ हैं!!
https://youtu.be/08HXDFRMpZ8
©SD. Arya
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