🎪 Note No. 70🎪
कभी - कभी स्थितियों और दृश्यों का बाह्य परिवेश जैसा दर्शित होता है, वैसा असल में होता नहीं है...बल्कि प्रदर्शन स्वरुप हमारे लिए एक भ्रम रचा जाता है, ताकि हमें उसके वास्तविक होने का आभास कराया जा सके। सारा तामझाम कुछ इस तरह रचा-बुना जाता है कि हम उसे नजरअंदाज कर असलियत की तह तक जा ही नहीं पाते...और यहीं से हमारी भावनाओं से खिलवाड़ होता हैं, हमारा गलत तरीके से इस्तेमाल हो चुका होता हैं और हम एक धोके के शिकार हो चुके होते हैं!...हमारे विश्वाश की धज्जियाँ उड़ाकर हमारा तमाशा बना दिया जाता हैं।...और हम!...हम बस उस सम्मुख प्रदर्शित दृश्य को ही बिना सोंचे समझे हकीकत मान बैठते हैं...जबकि माजरा कुछ और ही होता हैं..!!
©SD. Arya
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें