भीरुता लोगों के अंदर तक धँस जाती हैं और प्रमादों की विभिन्न परतों के प्रभाव से लोगों का ज़मीर दोषपूर्ण हो जाता हैं!!
"Note No. 67"
समाज के विभिन्न मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाजों में उलझकर रह जाना और उनके अनुरूप खुद को ढाल लेना ही तुम्हारे कमज़ोर चरित्र को दिखाता हैं...तुम्हारी बुज़दिली को दिखाता हैं...और ये दर्शाता हैं कि तुम्हारा किरदार कितना हीन अथवा तुच्छ हैं, जोकि अन्यथा ही गुलामी को ढो रहा हैं और एक बोझिल जिंदगी जी रहा हैं...याद रहे, इंसान का किरदार महत्वपूर्ण हैं! नज़रिया मेरा हो या मेरे जैसे किसी और का हो ये सरासर गलत ही हैं...मैं कभी ऐसी पाबन्दियों का मोहताज़ नहीं रहा और ना ही कभी हो सकता हूँ। मैंने हमेशा अपने दिल की आवाज़ सुनी हैं, वैसे हर किसी को सुननी चाहिए, जो बहुत कुछ कहती हैं और एक अलग सुकून देती हैं। गजब त्रासदी हैं...लोग अपनी आजादी और हकों के लिए कभी एकजुट नहीं हो पाते, दोषजन्य रीतियों अथवा रूढ़ियों के खिलाफ जाने की कभी हिम्मत नहीं जुटा पाते, बल्कि उन तमाम धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक अथवा जातिगत दूषित रूढ़ियों-कुरीतियों-अंधविश्वासों और बर्बर तथा हिंसक मान्यताओं को भी चुपचाप सहते जाते हैं, जोकि त्यजनीय एवं असहनीय होती हैं...भीरुता उनके अंदर तक धँस जाती हैं और प्रमादों की विभिन्न परतों के प्रभाव से लोगों का ज़मीर दोषपूर्ण हो जाता हैं तथा वे दोषयुक्त ही हो जाते हैं और ये सिलसिला आगे की ओर निरंतर प्रवाहित होता रहता हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अंधाधुन अपना लिया जाता हैं! निश्चित ही लोगों में ये भयंकर मानसिक विकृति हैं, जो उनमें दरिंदगी के मैल को उत्पन्न करती हैं पश्चात उनमें खूबसूरती के तत्व का ह्वास हो जाता हैं और इंसान अंदर और बाहर से बदसूरत-सा दिखने लगता हैं...तब दया, करुणा एवं पवित्र नैतिक मूल्य उनके लिए कोई मायने नहीं रखते...उनके लिए सिर्फ कटु, आततायी, आपराधिक और अधमता से भरे नियम-कायदे ही मायने रखते हैं...और ये सब अत्यंत चिंताजनक एवं शोकपूर्ण हैं...अफ़सोस लोग सरल विशुद्ध गहन तत्व को भी नहीं समझ सकते!! वास्तव में लोगों को सच्चे दिल से सही-गलत के अर्थों को महसूस कर लेना आना चाहिए...अपने अंतर्मन से सत्य-असत्य के भेदों को समझ लेना चाहिए...परिस्थिति विशेष में तुम खुद ही खुद के उद्धारक बन सकते हो...बाहरी शक्ति की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं! अमूनन हमारी प्राकृतिक स्वाधीनता के लिए हमें विभिन्न आडम्बर, क्रूरतम रीति-रिवाजों और झूठी रूढ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी ही होगी...समस्त बुरी प्रवृत्तियों का विरोध करना होगा और अति घातक एवं मूढ़ता से सनी मानसिक गुलामी की इन बेड़ियों को तोड़कर सही अर्थों में आजादी की महक को महसूस करना होगा...!! सत्य तो सत्य है... उसमें कभी अभाव एवं बदलाव नहीं होता...सत्य समस्त धर्म-संस्कृति, रीति-रिवाजों और नियमों से परे हैं...हमेशा विशुद्ध ही रहता हैं... सदा से एकसमान...उसमें कभी कोई अशुद्धि अथवा कमी नहीं आती... वो सदा-सदा से अनादि-अनंत, अजर-अमर और अविनाशी होता हैं।। ...और सत्य के अनुसरण में ही जीवन की सच्ची सार्थकता निहित हैं!!
©$D. @₹¥∆

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