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60. तुम्हारी साँसों का चलना ही महत्वपूर्ण हैं...

                  Note  No. 60 

           




           मुसीबतें कभी बताकर नहीं आती और जब आ जाती हैं, तो फिर आसानी से जाने का नाम भी नहीं लेती।बदनसीब हैं वो लोग जिनपर आफतों का पहाड़ टूट पड़ता हैं...और शायद मैं भी उसी वर्ग का एक हिस्सा हूँ, जो दुर्भाग्यवश जिंदगी से जुड़ी आफतों से जूझ रहा हूँ।

         बहुत बार समस्याओं के समाधान कभी नहीं  मिलते...और ना ही उनका कोई छोर...बस उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता हैं...उनके साथ ही घुटकर जीना होता हैं...उनके दर्द को बखूबी सहना होता हैं।इंसान दर्द से आक्रांत होकर रोता हैं, बिलखता हैं, तड़पता हैं किंतु चाहकर भी किसी निष्कर्ष-निवारण पर नहीं पहुंच पाता।...तत्पश्चात दर्द अथवा कष्ट का अतिरेक हो जाता हैं, जो जीवन को नितांत कमजोर कर देता हैं...आस्था, विश्वास और उम्मीदें सबकुछ लगभग टूट सी जाती हैं, जीवन निरुद्देश्य तथा सारहीन लगने लगता हैं और किसी बड़ी-पुरानी जर्जर हो चुकी ईमारत की भाँति भरभरा कर धराशायी हो जाता हैं।

           ...और अंतिम विनाश की इन घड़ियों में, जहां से कुछ भी शुरू नहीं किया जा सकता, तुम एक और विस्फोट कर सकते हो...ये बिल्कुल असम्भव-सा एवं मुश्किल होगा, लेकिन कदापि नामुमकिन तो नहीं! तुम फिर से नई ऊर्जा के साथ नई शुरुआत कर सकते हो...क्योंकि तुम्हारी साँसें तब भी चल रही होती हैं और यही महत्वपूर्ण हैं!!

                              ©SD. Arya

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