🔸 Note No. 48 🔸
और आखिरकार मैंने एक दिन इस बात को महसूस किया था कि, मैंने अपनी जिंदगी को निहायत मामूली और तुच्छ बना लिया हैं, जोकि मेरे लिए यथाक्रम उचित बात नहीं थी।
मैं सब जानता था कि मेरी इस तरह की मानसिक उथल पुथल के भयंकर दुष्परिणाम होंगे तथा ये मुझे काफी पीड़ा भी देगी...पर मैं नहीं माना ! मैं गलती पर गलती करता गया और अंततः उन हालातों में फँस चुका था, जहां से सुरक्षित निकल पाना लगभग मुश्किल था।
सचमुच मेरी वो हालत हो गई थी, जिसमें इंसान की सारी की सारी उम्मीदें धराशायी हो चुकी होती हैं। मैं उस जगह पर था जहां कोई नया सपना देखकर उसे साकार ना किया जा सके...मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी तथा मैं अत्यधिक हताश हो चुका था और ये मेरे लिए एक बड़ा आघात था।
मैं जीवन के उस घातक पड़ाव पर था जहां नाकामियां स्पष्ट दिख रही थी और जीत जाने का कोई विकल्प तब मेरे पास नहीं बचा था।
गुंजाईश तो कुछ नहीं बची थी कि मैं कुछ हासिल कर पाता...बावजूद कहीं ना कहीं मुझमे थोड़ा विश्वास जरूर जिंदा था, जिसके जरिये मैं फिर से एक नई शुरुआत कर सकता था। इस बुरे दौर में भी मैं सोचा करता था कि मुझे कुछ अच्छा करना हैं, जो हर किसी के लिए हितकारी हो...मैं आखिर साँस तक मुश्किल हालातों से लड़ना चाहता था। मैं बैसाखियों का मोहताज भी नहीं होना चाहता था और ना स्तब्ध रहना ही...मैं फिर से नूतन ऊर्जा को समेटे एक तेज़ रफ़्तार से दौड़ना चाहता था। मैं अपने वजूद को ऐसे ही बुझता हुआ स्वीकार नहीं कर सकता था । मैं फिर से साहस जुटाकर व तनमन से मजबूत बनकर अनन्य मुश्किलों के बावजूद दुर्गम रास्तों पर चलकर आगे बढ़ना चाहता था...निश्चित ही मैं विपदा की गहरी खाईयों से बाहर निकलना चाहता था ।
सच कहूं तो मैं एक नई आशा और विश्वास के साथ कुछ कर गुजरने के लिए तत्पर और प्रतिबद्ध होना चाहता था।
©सुदर्शन आर्य
और आखिरकार मैंने एक दिन इस बात को महसूस किया था कि, मैंने अपनी जिंदगी को निहायत मामूली और तुच्छ बना लिया हैं, जोकि मेरे लिए यथाक्रम उचित बात नहीं थी।
मैं सब जानता था कि मेरी इस तरह की मानसिक उथल पुथल के भयंकर दुष्परिणाम होंगे तथा ये मुझे काफी पीड़ा भी देगी...पर मैं नहीं माना ! मैं गलती पर गलती करता गया और अंततः उन हालातों में फँस चुका था, जहां से सुरक्षित निकल पाना लगभग मुश्किल था।
सचमुच मेरी वो हालत हो गई थी, जिसमें इंसान की सारी की सारी उम्मीदें धराशायी हो चुकी होती हैं। मैं उस जगह पर था जहां कोई नया सपना देखकर उसे साकार ना किया जा सके...मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी तथा मैं अत्यधिक हताश हो चुका था और ये मेरे लिए एक बड़ा आघात था।
मैं जीवन के उस घातक पड़ाव पर था जहां नाकामियां स्पष्ट दिख रही थी और जीत जाने का कोई विकल्प तब मेरे पास नहीं बचा था।
गुंजाईश तो कुछ नहीं बची थी कि मैं कुछ हासिल कर पाता...बावजूद कहीं ना कहीं मुझमे थोड़ा विश्वास जरूर जिंदा था, जिसके जरिये मैं फिर से एक नई शुरुआत कर सकता था। इस बुरे दौर में भी मैं सोचा करता था कि मुझे कुछ अच्छा करना हैं, जो हर किसी के लिए हितकारी हो...मैं आखिर साँस तक मुश्किल हालातों से लड़ना चाहता था। मैं बैसाखियों का मोहताज भी नहीं होना चाहता था और ना स्तब्ध रहना ही...मैं फिर से नूतन ऊर्जा को समेटे एक तेज़ रफ़्तार से दौड़ना चाहता था। मैं अपने वजूद को ऐसे ही बुझता हुआ स्वीकार नहीं कर सकता था । मैं फिर से साहस जुटाकर व तनमन से मजबूत बनकर अनन्य मुश्किलों के बावजूद दुर्गम रास्तों पर चलकर आगे बढ़ना चाहता था...निश्चित ही मैं विपदा की गहरी खाईयों से बाहर निकलना चाहता था ।
सच कहूं तो मैं एक नई आशा और विश्वास के साथ कुछ कर गुजरने के लिए तत्पर और प्रतिबद्ध होना चाहता था।
©सुदर्शन आर्य

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