Note No. 44
कुछ पल होते है, जो हमारी जिंदगी में आकर्षक और भरपूर खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, यदि इन्हें उल्लास के साथ जी लिया जाये तो हमारे पास हमेशा के लिए बेहतरीन यादों का कोष रह जाता हैं, जो कभी ख़त्म नहीं होता...और यद्भविष्य में जब हम अपने बीते वक्त को याद करते हैं, तो ये खुशनुमा लम्हें जो हमारी बेहतरीन यादों में संचय रहते हैं...हमें अलहदा ख़ुशी का कमाल का अहसास कराते हैं ये बड़ा ही सुकून देते है और तब जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रहती हैं ।
और यदि हमने उन खास पलों को, जो हमारी जिंदगी में दस्तक देते है ऐसे ही जाने दिया अथवा उन्हें जी लेने का लुत्फ़ ना उठाया...तो फिर हमारे पास अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं बचता। आगे जब हम गुजर चुकी जिंदगी को टटोलते हैं, तो हमें खूबसूरत यादों के रूप में कुछ नहीं मिलता है...वहां सबकुछ खाली-खाली और उजड़ा सा लगता हैं और तब हम पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं कर सकते और आगे एक बोझिल जिंदगी को जीने की मज़बूरी के साथ हमें समझौता कर लेना पड़ता हैं...हम जिस तरह से जीवन में जिए उसका यह प्रतिफल स्वरुप हमें मिलता हैं...यही एक विकल्प बचता हैं हम चाहकर भी कुछ नहीं चुन सकते!
आखिरकार अंततः जब हम इस बात को स्वतः ही महसूस कर सकते हैं कि इन लम्हों की अवहेलना हमें त्रासदी के अतिरिक्त कुछ नहीं देगी...तो फिर क्यों...आखिर क्यों हम गलती करें !
कुछ पल होते है, जो हमारी जिंदगी में आकर्षक और भरपूर खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, यदि इन्हें उल्लास के साथ जी लिया जाये तो हमारे पास हमेशा के लिए बेहतरीन यादों का कोष रह जाता हैं, जो कभी ख़त्म नहीं होता...और यद्भविष्य में जब हम अपने बीते वक्त को याद करते हैं, तो ये खुशनुमा लम्हें जो हमारी बेहतरीन यादों में संचय रहते हैं...हमें अलहदा ख़ुशी का कमाल का अहसास कराते हैं ये बड़ा ही सुकून देते है और तब जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रहती हैं ।
और यदि हमने उन खास पलों को, जो हमारी जिंदगी में दस्तक देते है ऐसे ही जाने दिया अथवा उन्हें जी लेने का लुत्फ़ ना उठाया...तो फिर हमारे पास अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं बचता। आगे जब हम गुजर चुकी जिंदगी को टटोलते हैं, तो हमें खूबसूरत यादों के रूप में कुछ नहीं मिलता है...वहां सबकुछ खाली-खाली और उजड़ा सा लगता हैं और तब हम पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं कर सकते और आगे एक बोझिल जिंदगी को जीने की मज़बूरी के साथ हमें समझौता कर लेना पड़ता हैं...हम जिस तरह से जीवन में जिए उसका यह प्रतिफल स्वरुप हमें मिलता हैं...यही एक विकल्प बचता हैं हम चाहकर भी कुछ नहीं चुन सकते!
आखिरकार अंततः जब हम इस बात को स्वतः ही महसूस कर सकते हैं कि इन लम्हों की अवहेलना हमें त्रासदी के अतिरिक्त कुछ नहीं देगी...तो फिर क्यों...आखिर क्यों हम गलती करें !
©SD. Arya

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