Note No. ‘40’
किसी ने मुझसे पूछा था, " कि तुमने क्या लक्ष्य बना रखा है ? " जाहिर है उनका मतलब था कि मैं अपनी जिंदगी में आगे चलकर क्या बनूँगा यानि ऐसा कौनसा काम करूँगा या आखिरकार किस तरह का मकाम हासिल करूँगा जो मुझे पैसा और प्रतिष्ठा दे सके।...अब मैं उनसे क्या कहता...मैं थोड़ी देर खामोश रहा...फिर उनसे कहा कि ऐसी कोई इच्छा मैंने कभी की ही नहीं...इस बारे में मैंने कभी गहराई से सोचा ही नहीं कि अंततः मुझे क्या बनना है..?
तब मैं किसी लक्ष्य विशेष को टारगेट में नहीं रखता था...मैं बस अपना समय बिता रहा था। मेरी कई ख्वाहिशें रही थी, जिन्हें मैं दिल से पूरा करना चाहता था...मैं खुले - अंतहीन आकाश में दूर बहुत दूर ऊँची उड़ान भरना चाहता था...किसी सीमित दायरे में बंधकर में नहीं रहना चाहता था..!
और इस तरह मैंने कभी लक्ष्य निर्धारण का दबाव महसूस नहीं किया था...और कभी ऐसी आशा हुई होती तो शायद अभी तक कोई सिविल सर्विस कर रहा होता...लेकिन मैं उस किस्म का था ही नहीं...तभी तो आज इस अवस्थिति में हूँ।
अमूनन कदाचित या इत्तेफ़ाक से मैं ऐसा शख्स था जो एक ही राह पर चलता हुआ अंततः बहुत - सी मंजिलों पर जाना चाहता था..!
©SD. Arya
तब मैं किसी लक्ष्य विशेष को टारगेट में नहीं रखता था...मैं बस अपना समय बिता रहा था। मेरी कई ख्वाहिशें रही थी, जिन्हें मैं दिल से पूरा करना चाहता था...मैं खुले - अंतहीन आकाश में दूर बहुत दूर ऊँची उड़ान भरना चाहता था...किसी सीमित दायरे में बंधकर में नहीं रहना चाहता था..!
और इस तरह मैंने कभी लक्ष्य निर्धारण का दबाव महसूस नहीं किया था...और कभी ऐसी आशा हुई होती तो शायद अभी तक कोई सिविल सर्विस कर रहा होता...लेकिन मैं उस किस्म का था ही नहीं...तभी तो आज इस अवस्थिति में हूँ।
अमूनन कदाचित या इत्तेफ़ाक से मैं ऐसा शख्स था जो एक ही राह पर चलता हुआ अंततः बहुत - सी मंजिलों पर जाना चाहता था..!
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