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बुरे आंतरिक घुसपैठियों के साथ मेरा संघर्ष।

                      🔸Note No. *41*🔸


                बहुत - सी बातें थी, जो मेरे अंदर चलती रहती थी और अक्सर मुझे भ्रम की स्थिति में डाल देती थी । संशय बना ही रहता था पर उनका समाधान नहीं मिल पाता था । उन्हें सुलझा पाने में, मैं सर्वथा असमर्थ ही रहता था और कभी निदान के करीब पहुँचता भी था तो कोई दूसरी बाधा पैदा हो जाती थी...कोई दूसरी...फिर कोई दूसरी और यह सिलसिला चलता ही रहता था । अतः इस तरह से मैं वृथा - मिथ्या भ्रांतियों के जाल में फंसकर अपना बहुत सा कीमती वक्त बर्बाद कर चुका था...मैं उसका असल उपयोग और मूल्य नहीं समझ पाया था । मैं बस उन मनःसृष्ट अनर्गल बातों में मशगूल था जिनका कोई मतलब नहीं था ।
           और...आखिरकार एक लंबे अंतराल के गुजर जाने तथा तमाम विरोधाभासों के बावजूद मैंने साहस जुटाकर स्वयं को बदलने का निश्चय किया...मैंने ठान लिया था कि अब मैं किसी भी तरह के निष्प्रयोजन संशयों में उलझकर अपना कीमती बहुमूल्य वक्त जाया नहीं करूँगा । मैं अब संभलने लगा था...सही चीजें चुनने की कोशिश करने लगा था..मैं अपने अंदर के अंतर्द्वंदों से आजाद होने लगा था । मैं अपने तमाम रहस्यमयी पहलुओं के दर्द को दफ्न करने लगा था...मैं उन सब बातों और  तनावों से दूर हो जाना चाहता था जो मेरे लिए अत्यंत तकलीफ देह थी । और इस आमूल परिवर्तन के लिए मैं लगभग दृढ़ संकल्पित और प्रतिबद्ध था..!
                                                
                                               ©SD. Arya

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