🤸Note 35🤸
बचपन में मुझे गुड़ खाना बेहद पसंद था...मैं खूब गुड़ खाया करता था...इतना ज्यादा कि उसकी वजह से गर्मी के तपते दिनों में कई बार मेरी नाक से खून बहने लगता था।
घर में कितना ही गुड़ क्यों ना रखा हो मैं उसे सफाचट करने की फ़िराक में ही लगा रहता था।
माँ से चोरी - छिपे मैं जार से गुड़ निकालकर बाहर भाग जाता था और खूब आनंदानुभूति के साथ खाता था।
गांव में जहां कहीं गुड़ बनाने का चरखा चलता था, वहां हम बच्चों की टोली पहुँच जाती थी। जब तक गुड़ बनने का सीजन चलता हम सभी वहां जाते रहते थे।उस ताजे बने गुड़ को खाना मजेदार होता था...वह गजब का स्वादिष्ट लगता था।
चरखे वाले हमसे गुड़ देने के बदले थोड़ा काम भी करवाते थे...वो हमसे भट्टी में गन्नों के सूखे गत्ते आदि डलवाते थे...और यदि हम कोई काम नहीं भी करते...तो भी हमें रोजाना खाने के लिए मुफ्त में गुड़ मिल जाता था। हम पलाश के बड़े वाले पत्ते चुनकर ले आते थे जिसपर हम अपने-अपने हिस्से का गुड़ लेते थे...खैर !
बचपन में मुझे गुड़ खाना बेहद पसंद था...मैं खूब गुड़ खाया करता था...इतना ज्यादा कि उसकी वजह से गर्मी के तपते दिनों में कई बार मेरी नाक से खून बहने लगता था।
घर में कितना ही गुड़ क्यों ना रखा हो मैं उसे सफाचट करने की फ़िराक में ही लगा रहता था।
माँ से चोरी - छिपे मैं जार से गुड़ निकालकर बाहर भाग जाता था और खूब आनंदानुभूति के साथ खाता था।
गांव में जहां कहीं गुड़ बनाने का चरखा चलता था, वहां हम बच्चों की टोली पहुँच जाती थी। जब तक गुड़ बनने का सीजन चलता हम सभी वहां जाते रहते थे।उस ताजे बने गुड़ को खाना मजेदार होता था...वह गजब का स्वादिष्ट लगता था।
चरखे वाले हमसे गुड़ देने के बदले थोड़ा काम भी करवाते थे...वो हमसे भट्टी में गन्नों के सूखे गत्ते आदि डलवाते थे...और यदि हम कोई काम नहीं भी करते...तो भी हमें रोजाना खाने के लिए मुफ्त में गुड़ मिल जाता था। हम पलाश के बड़े वाले पत्ते चुनकर ले आते थे जिसपर हम अपने-अपने हिस्से का गुड़ लेते थे...खैर !
©SD. Arya

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें