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जब कभी मैं मस्ती या शरारत करता अथवा कोई ऐसी हरकत करता,जो उसे बिल्कुल नहीं सुहाती तो फिर वो मेरी झट से धुलाई कर देती थी।...मुझे याद है, वो मेरा कान भी खूब दबाती थी और तब मैं उसके पूरे नियंत्रण में रहता था फिर वो मुझसे कई बातों को मनवाने की शपथ दिलाती और मैं उसकी सारी बातों को मानने का उसे विश्वास दिलाता।वाकई बहना की उस मार और प्रताड़ना में अपनत्व का असीम प्यार और स्नेह निहित रहता था।
कभी - कभी तो मैं उसके हाथ नहीं आता तो वो और भी ज्यादा गुस्सा हो जाती और मुझे पकड़ने के लिए मेरे पीछे लग जाती थी...लेकिन मैं जरा देर में कहां से कहां निकल जाता और उसके हाथ नहीं आता। कई बार दीदी मुझे पकड़ भी लेती थी और फिर मेरी अच्छी खासी पिटाई भी कर देती थी...कभी तो मैं उसके सम्मुख नटखट और मासूमियत से भरी शरारत कर देता तो उसका सारा क्रोध शांत हो जाता और वह अपने गुस्से को भूलकर हंसने लगती और पीटने के बजाय मुझे स्नेहववश दुलार करती।
जब कभी बहना मुझे जरा - सी मारती, तो मैं इस खयाल से कि बहना ने मुझे इतनी सी बात पर ही क्यों पीटा...ये सोचकर खूब रोने लगता तो उसे भी पछतावा होता और तब वह मेरे पास आके मुझे समझाने - बुझाने लग जाती...मेरे आंसू पौंछती और बड़े प्यार से मुझे मनाने के लिए तरह तरह के मृदुल शब्दों का प्रयोग करती थी। अंततः मैं उसके ममत्व भरे अहसास से आभास पाके सिसकता हुआ थोड़ी ही देर में चुप रह जाता था।
मेरी बहन बचपन में मुझे अक्सर ' नाना ' कहके बुलाती थी।
और जब कभी मैं घर से बाहर निकलकर अपने साथियों के साथ खेलता रहता था तो वो मुझे बुलाने आ जाती थी...और तब मेरे बुलाने के लिए उसके मुख से निकले वो शब्द मुझे अपनेपन का बेहद खूब एहसास कराते थे।
बड़ी बहन का मेरे प्रति वो स्नेहिल सख्त रवैया मेरे लिए आज भी आदरणीय है उसकी सख्ती में भी अनन्य - अगाध स्नेह भाव थे जिनका मैं आदर करता हूं।
और आज जिंदगी के इस पायदान पर वो मुझे स्नेहछाया प्रदान करने के लिए कहां मेरे पास मौजूद हैं...अब उसकी एक अलग, व्यस्त जिंदगी है और एक नया परिवार, जिसके लिए वो हरदम तत्पर रहती होगी।
मेरी बहना ने मुझे मेरे बचपन में एक मां के सदृश महान् ममत्व का अहसास दिलाया था, जिसे मैंने महसूस भी किया था, पर तब मेरा भोला मानस इतना सबकुछ कैसे समझ पाता...मगर आज उसका अहसास मुझे बखूबी हैं और उसकी इस सहृदयता की मैं कद्र करता हूं..!
©SD. Arya

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