🔸Note No. 37🔸
ये मैं कहाँ था...क्या कर रहा था...किस तरफ जा रहा था...तथा जिस क्रम को मैंने चुना था वो मुझे कहां तक ले जाने वाला था...कितनी ही उलझनें थी जो अक्सर असमंजस की स्थिति में डाल देती थी !
असुरक्षित वजूद की गिरफ्त में फंसा मैं एक वक्त पर विपत्ति से सने उस पायदान पर जा चुका था जहां मुझे उन सब हालातों से गुजरना पड़ रहा था जिनसे मैं बहुत दूर था...और ये मेरी अफ़सोसजदा बाध्यता ही थी कि उन्हें मैं बर्दाश्त कर रहा था। निश्चित रूप से मैं इतना निस्तब्ध और विवश हो चुका था कि कुछ पहल नहीं कर सकता था...बस ख़ामोश खड़ा देख ही सकता था...आवाज कहां उठा पाता !
वस्तुतः मैं दुर्दशा के दलदल में धंसता जा रहा था...मैं उस अवस्था स्तर की पीड़ा को अंतःप्रकट रूप में महसूस करने लगा था, जिसके प्रतिकूल उत्प्रवाह विघटित होने वाले थे..!
असुरक्षित वजूद की गिरफ्त में फंसा मैं एक वक्त पर विपत्ति से सने उस पायदान पर जा चुका था जहां मुझे उन सब हालातों से गुजरना पड़ रहा था जिनसे मैं बहुत दूर था...और ये मेरी अफ़सोसजदा बाध्यता ही थी कि उन्हें मैं बर्दाश्त कर रहा था। निश्चित रूप से मैं इतना निस्तब्ध और विवश हो चुका था कि कुछ पहल नहीं कर सकता था...बस ख़ामोश खड़ा देख ही सकता था...आवाज कहां उठा पाता !
वस्तुतः मैं दुर्दशा के दलदल में धंसता जा रहा था...मैं उस अवस्था स्तर की पीड़ा को अंतःप्रकट रूप में महसूस करने लगा था, जिसके प्रतिकूल उत्प्रवाह विघटित होने वाले थे..!
©SD. Arya

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