🔸Note No. 33🔸
लोग मिलते है...और तरह - तरह की बातें करते हैं..! ज्यादातर बातों में बेवजह के शब्द होते हैं।...मैं उनकी बातों को एक अदब से सुन लेता हूँ...समझने की कोशिश करता हूं पर समझ नहीं पाता...पता नहीं वो कितना और क्या - क्या बिना किसी मतलब का बोल जाते हैं...पर आखिर हम क्या कर सकते हैं...शायद कुछ भी तो नहीं..!
वे सभी अपनी बातों को अपने - अपने तरीके से सिद्ध करने पर तुले रहते हैं...और मूल बात से दूर चले जाते हैं।वो कभी भी ये नहीं समझ पाते और ना ही कभी समझने का प्रयास ही करते हैं कि जिन फिजूल की बातों का इस्तेमाल वो खुद के उपजाये मिथ्या विश्वास से और अपनी अल्पज्ञतावश व मनमाने ढंग से किये जा रहे हैं...उनका कोई वांछित लक्ष्य अथवा परिणाम नहीं हैं विपरीत इसके उनकी इन अनर्गल बातों और शब्दों से अन्यत्र संपर्क में आने वाले लोगों को तकलीफ ही होती हैं,और यह कष्ट उन सभ्य जनों के लिए अत्यंत - असहनीय होता है जिनकी अपनी एक मर्यादित जीवन शैली होती हैं और जो कुछ आदर्शों का पालन करते हुए सुचारू रूप से अपने जीवन पथ पर गतिमान रहते हैं।
वे सभी अपनी बातों को अपने - अपने तरीके से सिद्ध करने पर तुले रहते हैं...और मूल बात से दूर चले जाते हैं।वो कभी भी ये नहीं समझ पाते और ना ही कभी समझने का प्रयास ही करते हैं कि जिन फिजूल की बातों का इस्तेमाल वो खुद के उपजाये मिथ्या विश्वास से और अपनी अल्पज्ञतावश व मनमाने ढंग से किये जा रहे हैं...उनका कोई वांछित लक्ष्य अथवा परिणाम नहीं हैं विपरीत इसके उनकी इन अनर्गल बातों और शब्दों से अन्यत्र संपर्क में आने वाले लोगों को तकलीफ ही होती हैं,और यह कष्ट उन सभ्य जनों के लिए अत्यंत - असहनीय होता है जिनकी अपनी एक मर्यादित जीवन शैली होती हैं और जो कुछ आदर्शों का पालन करते हुए सुचारू रूप से अपने जीवन पथ पर गतिमान रहते हैं।
निष्कर्ष या आशय यही है कि आखिर क्यों लोग इस तरह के शब्दों अथवा बातों का उपयोग करते हैं, जो किसी भी तरह उचित नहीं हैं..?...आखिर क्यों वे इस ख़याल से बेखबर होते हैं कि उनकी बेहूदा बातों से किसी को तकलीफ हो सकती हैं..!...वे क्यों इस पहलू पर विचार नहीं कर पाते कि उनकी अनैतिक बातों की इस दुनिया में कोई अहमियत नहीं हैं..?
©SD. @rya
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