🔸Note No. ‘39’🔸
जहाँ तक कृष्ण के संबंध में प्रामाणिक जानकारी के हिसाब से मैं उनके वजूद को स्वीकार करता हूँ कि एक श्रेष्ठ एवं योगि - श्रेष्ठ व्यक्ति महाभारत काल में हुए थे । मैं श्री कृष्ण को योगीराज व विज्ञ - महापुरुष मानता हूँ...जिन्होंने महाभारत - महासंग्राम में महान नीतिज्ञ - निर्णायक की भूमिका अदा की थी ।
और हाँ हमारे विश्व समाज में सदियों से ना जाने किस - किस तरह के कपोल - कल्पित किरदार ऊपजा लिए गए हैं तथा लोगों में उन किरदारों के प्रति मिथ्या आस्था भी उत्पन्न हो चुकी है,जिसका कोई हल फिलहाल तो नामुमकिन सा लगता हैं...खैर!
मैं मूर्तिपूजा , धार्मिक - आडम्बर , अंधविश्वास , रूढ़िवादिताओं , बेतुके रीति - रिवाजों और ऐसे ही कईं प्रकार की मिथ्या क्रियाओं तथा मान्यताओं के सख्त खिलाफ हूँ ।
मैं हृदय से मूल व यथोचित सृष्टि सम्मत आदि सनातन धर्मी हूँ...मैं विशुद्ध तथा ईश्वरकृत सत्य एवं यथार्थ ज्ञान के पुंज चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) का अनुकरण करता हूँ ।
मेरा मानना है कि जब इंसान जिंदगी के हर मोड़, हर परिस्थिति व समय में या लगभग सभी मामलों में दिल से सच्चा होता हैं तथा पूरी श्रद्धा और ईमानदारी से अपने फर्ज को अदा करता हैं, तो वह उस अनादि - अनंत - निराकार - सर्वशक्तिमान ''परमेश्वर'' अथवा "GOD" की उत्कृष्ट कृतियों का हिस्सा बन जाता हैं ।
लेकिन मेरा क्या मानना एवं क्या न मानना मुझ और मुझ जैसे कुछेक लोगों तक ही सीमित हैं...जबकि औरों की आस्थाएं विभिन्न स्रोतों से जुड़ी हुई होती हैं, जिन्हें बदल पाना या उनमें सत्यार्थ - प्रकाश कर पाना लगभग नामुमकिन हैं...हालाँकि मैं औरों की भावनाओं को समझ सकता हूँ तथा खैर जो भी हो उनकी क़द्र करता हूँ...और अंततः अर्थात मेरे इन शब्दों से किसी की आस्था को ठेस पहुंची हो या किसी की भावना ही आहत हुई हो तो मैं उन सब से क्षमा चाहता हूँ...हो सके तो मुझे माफ़ कर देना..!
मैं मूर्तिपूजा , धार्मिक - आडम्बर , अंधविश्वास , रूढ़िवादिताओं , बेतुके रीति - रिवाजों और ऐसे ही कईं प्रकार की मिथ्या क्रियाओं तथा मान्यताओं के सख्त खिलाफ हूँ ।
मैं हृदय से मूल व यथोचित सृष्टि सम्मत आदि सनातन धर्मी हूँ...मैं विशुद्ध तथा ईश्वरकृत सत्य एवं यथार्थ ज्ञान के पुंज चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) का अनुकरण करता हूँ ।
मेरा मानना है कि जब इंसान जिंदगी के हर मोड़, हर परिस्थिति व समय में या लगभग सभी मामलों में दिल से सच्चा होता हैं तथा पूरी श्रद्धा और ईमानदारी से अपने फर्ज को अदा करता हैं, तो वह उस अनादि - अनंत - निराकार - सर्वशक्तिमान ''परमेश्वर'' अथवा "GOD" की उत्कृष्ट कृतियों का हिस्सा बन जाता हैं ।
लेकिन मेरा क्या मानना एवं क्या न मानना मुझ और मुझ जैसे कुछेक लोगों तक ही सीमित हैं...जबकि औरों की आस्थाएं विभिन्न स्रोतों से जुड़ी हुई होती हैं, जिन्हें बदल पाना या उनमें सत्यार्थ - प्रकाश कर पाना लगभग नामुमकिन हैं...हालाँकि मैं औरों की भावनाओं को समझ सकता हूँ तथा खैर जो भी हो उनकी क़द्र करता हूँ...और अंततः अर्थात मेरे इन शब्दों से किसी की आस्था को ठेस पहुंची हो या किसी की भावना ही आहत हुई हो तो मैं उन सब से क्षमा चाहता हूँ...हो सके तो मुझे माफ़ कर देना..!
©SD. Arya



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