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मेरे बचपन के अधिकतर दिन मेरे मामा के यहां गुजरे थे।मामा के घर रहके मैंने अपने बचपन में खूब मस्तियाँ की।
पहाड़ी पर बसा वह छोटा-सा गांव ऊमराझर मुझे बहुत लुभाता था...यहाँ रहके मैं सुकून महसूस करता था।
इस गांव में 'गुज्जर'(गुर्जर) और 'बंजारा' समुदाय के लोग अधिक संख्या में रहते थे।
यहां मैं अपने साथियों के साथ खूब खेला करता था।हम कई तरह के खेलों में व्यस्त रहते थे, जिनमें अधिकांशतः शारीरिक हलचल से भरे होते थे।हम देर रात तक बाहर खेला करते थे...घर जाने की जल्दी हमें नहीं होती थी...यदाकदा ही घर वालों के दबाववश घरों में जल्दी चले जाते थे...नहीं तो अंधेरा होने से पहले हमें घर में घुसना पसंद नहीं था।
कई बार हम जंगलों में दूर-दूर तक गए।वहां जंगल में तरह-तरह के पेड़-पौधें और झाड़ियां पायी जाती थी...अतः हमें इनसे खाने के लिए तरह-तरह के फल मिलते थे।कुछ झाड़ियों और पेड़ों से बहुत स्वादिष्ट गोंद भी खाने को मिलता था,कुछेक पौधों-झाड़ियों की नरम कोंपलें भी खाने लायक होती थी।
वहां के जंगलों में करौंदे की झाड़ियां खूब पाई जाती थी...हम सभी करौंदा खाने भी बहुत जाते थे...और मैं तो बिना थूके इतने अधिक करौंदे खा लिया करता था कि मेरा पेट दुखने लगता था...वाकई उस तरह के पेटदर्द का भी अलग ही मजा था।
वहाँ चारौली के पेड़ भी बहुत थे...पता नहीं अब है या बेरहम लोगों के शिकार हो गए । ऊमराझर की खड़ी बोली में 'चारौली' को 'चाल्डा' कहा जाता है।पके हुए चाल्डा बहुत स्वादिष्ट लगते थे।चाल्डा का पका-पका फल भाग खाने के बाद उसके अंदर के कठोर हिस्से को हम पत्थर पर फोड़कर उसमें से बीज निकालकर खाते थे ,जो बहुत अच्छे लगते थे।...मुझे एक फल और याद आ रहा है, जिसे मैं बड़े चाव से खाता था।उसे वहां के लोग 'गोलगांगड़ा' कहते थे।गोलगांगड़ा छोटी झाड़ी पर गुच्छों में लगने वाले छोटे-छोटे फल थे...इनमें से थोड़ा-थोड़ा गुड़ जैसा टेस्ट आता था और इनका रंग भी गुड़ जैसा ही था।मुझे तो गोलगांगड़ा खाना बहुत पसंद था पर मेरे साथ रहने वाले कुछ लड़के-लड़कियों को ये गोलगांगड़ा मेरे जितने पसंद नहीं थे।
मैं कई बार बेवजह ही अपने साथियों के साथ दूर-दूर तक जंगलों में जाया करता था...बेवजह इसलिए कि वे सभी अपने-अपने पशुओं को चराने जाते थे और मैं यूँ ही उनके साथ हो लेता था... आखिर कोई तो वजह थी जो मुझे उनके साथ बिना किसी वजह के भी रहने को बाध्य करती थी..!...मेरे लिए उनका साथ पाना ही एक बहुत मायने रखने वाली वजह थी।
कई मर्तबा मेरी नानी मुझे ढूंढ-ढूंढकर परेशान हो जाती थी पर मैं उसे कहीं नहीं मिलता...मेरी नानी ने भी मुझे बेहद प्यार दिया है और मैं उन्हें अब भी बहुत याद करता हूँ...और कहना दुःखद है कि वो अब इस दुनिया में नहीं है...मगर मेरी यादों में ताउम्र जिन्दा रहेगी।
...और...हम शारीरिक उठापटक के बहुत से खेल जोखिम लेकर खेला करते...कई बार गिरते पड़ते फिर उठते...चोटें भी लगती...पर हमें चोटों की परवाह कहाँ होती थी...और हम एक दूसरे के दम को परखने के लिए कुश्ती भी खेलते थे।
कबड्डी, खोखो, पकड़म-पाटी, गधा-मार, सितोलिया, शेर-बकरी, गिल्ली-डंडा, कलाम-डाला, आँख-मिचौली, लुका-छुपी, पऊवा इत्यादि खेल खेलते थे।...और कई सारे दिमागी खेल भी हम घरों में बैठकर खेलते थे।
इस तरह मामा के गांव में बीते मेरे बचपन के दिन शानदार रहे...वहां रहकर मैंने अपने बाल्यकाल का भरपूर लुत्फ़ उठाया था।
©Sudarshan Arya
मैं कई बार बेवजह ही अपने साथियों के साथ दूर-दूर तक जंगलों में जाया करता था...बेवजह इसलिए कि वे सभी अपने-अपने पशुओं को चराने जाते थे और मैं यूँ ही उनके साथ हो लेता था... आखिर कोई तो वजह थी जो मुझे उनके साथ बिना किसी वजह के भी रहने को बाध्य करती थी..!...मेरे लिए उनका साथ पाना ही एक बहुत मायने रखने वाली वजह थी।
कई मर्तबा मेरी नानी मुझे ढूंढ-ढूंढकर परेशान हो जाती थी पर मैं उसे कहीं नहीं मिलता...मेरी नानी ने भी मुझे बेहद प्यार दिया है और मैं उन्हें अब भी बहुत याद करता हूँ...और कहना दुःखद है कि वो अब इस दुनिया में नहीं है...मगर मेरी यादों में ताउम्र जिन्दा रहेगी।
...और...हम शारीरिक उठापटक के बहुत से खेल जोखिम लेकर खेला करते...कई बार गिरते पड़ते फिर उठते...चोटें भी लगती...पर हमें चोटों की परवाह कहाँ होती थी...और हम एक दूसरे के दम को परखने के लिए कुश्ती भी खेलते थे।
कबड्डी, खोखो, पकड़म-पाटी, गधा-मार, सितोलिया, शेर-बकरी, गिल्ली-डंडा, कलाम-डाला, आँख-मिचौली, लुका-छुपी, पऊवा इत्यादि खेल खेलते थे।...और कई सारे दिमागी खेल भी हम घरों में बैठकर खेलते थे।
इस तरह मामा के गांव में बीते मेरे बचपन के दिन शानदार रहे...वहां रहकर मैंने अपने बाल्यकाल का भरपूर लुत्फ़ उठाया था।
©Sudarshan Arya

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