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तमाम विसंगतियों से परे...तुम अपना सर्वोच्च मकसद चुन सकते हो

                  Note No. '101'

   

   

        वही करो जो तुम्हें सही लगता हो...और जो वास्तव में सही भी हो।                                                                                हम जो कुछ भी करते हैं उसपर लोग ऊंगली उठा सकते हैं...हमें उसके लिए बीच में टोक सकते हैं, क्योंकि शायद उनके लिए हमारा उठाया गया सही कदम भी सही ना लगता हो। ये हो सकता हैं वो तुम्हारे सच्चे और बुलंद इरादों को ना समझ पाएं या वे समझने की कोशिश ही ना करते हों अथवा ये भी हो सकता हैं कि उनमें हमारे सही कदमों के प्रति द्वेष की भावना हो...और इस तरह पता नहीं उनकी जाने किस तरह की मैली मानसिकता रहती हैं।...और ये उन लोगों की समस्या हैं कि वे किसी की सर्वोच्च–हितकारी भावनाओं और कामों को समझ नहीं पाते...उनका जमीर ही ऐसा होता हैं कि वो सर्वथा–सत्य के विभिन्न पहलुओं को गहराई से महसूस और स्वीकार कर ही नहीं सकते...उनके हृदय निर्दयता से भरे और सख्त होते हैं...और भी कईं खौफनाक और निरर्थक–अनर्थक बातें होती हैं, जो उनके अंदर विद्यमान रहती हैं।                                                   और अंततः इन सब बातों एवं विसंगतियों से अलग हटकर तुम अपना सर्वोच्च–सर्वहितार्थ की भावना से भरपूर मकसद चुन सकते हो।                                                                       लोग क्या सोचेंगे...?...तुम्हें क्या बोलेंगे...तुम्हारे बारे में औरों से क्या कहेंगे तथा तुम्हें लेकर ना जाने क्या और किस तरह के खयालात बुनेंगे?...ये सब तब फिजूल हो जाता हैं, जब तुम अपनी राह पर हरदम–हरकदम सही होते हो।                                   तुम जगत की तमाम अवहेलनाओं और बकवासों को ताक पर रखकर दुनिया के विशाल रंगमंच पर अपनी बेहतरीन भूमिका अदा कर सकते हो..!

                                               ©SD. Arya 

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