Note No. *100*
हम कभी इतने बुरे नहीं होते कि एक अच्छी शुरुआत नहीं कर सकते...ठीक उस फुटबालर की तरह, जिसके बचपन में उससे नादानी वश हुई गलती से उसके मित्र की मौत हो जाती हैं...और मित्र की मौत का जिम्मेदार वो खुद को ठहराता हैं...बहुत लंबे समय तक वो ये हादसा भूल नहीं पाता हैं और मन ही मन खुद को कोसता हैं, उसे इसका दर्द सालता रहता हैं...वो खुद को बहुत बुरा समझ लेता हैं और हरवक्त दुःखी रहता हैं...और तब, जब उसे वाकई किसी के सहारे की ज़रूरत थी...उसके पिता उसके सच्चे हमदर्द साबित होते हैं...और अंततः वही लड़का, जो बिल्कुल डूब सा गया था...अब ब्राजील का महान फुटबालर "पेले" बन चुका होता हैं। दरअसल बात ये हैं कि हम किसी तरह की बात अथवा हादसे को लेकर खुद को कोसते ही ना रहे और अपने आप को इतना अधिक बुरा भी ना समझे कि खुद से ही नफरत सी होने लगे...बजाय इसके हम जीवन के किसी भी दौर में, कुछ भी पा सकते हैं। हममें कुछ कर गुजरने की फ़िक्र छुपी होनी चाहिए और हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए, तो हम कभी भी नई शुरुआत कर सकते हैं। ये हो सकता हैं कि हमारे अंदर अपने अतीत की कुछ बुरी यादें घर कर लेती हैं, जो अत्यंत कष्टकारी होती हैं...और अफ़सोस की आग में जलते रहत हैं...हरवक्त हम परेशान से रहने लगते हैं और यद्यपि हमें कुछ समझ नहीं आता कि हम क्या करें...बस हरदफा बोझिल सा महसूस करते हैं...हम मन ही मन घुटने लगते हैं। ऐसे में हमारे पास दो रास्ते होते हैं...या तो हम अपनी विकार युक्त मनोदशा के साथ खुद का जीवन बदहाल और बेहद बदहाल बना ले या फिर हम खुद को मजबूत बनाकर जिंदगी को एक नई उड़ान देने के लिए पूरे मन से दृढ़ संकल्पवान बन जाएं...निर्भर करता हैं हम दोनों में से क्या चुनते हैं !
©SD. Arya

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