Note No. '91'
उस समय मैं ‘अल्केमिस्ट’ नाम की किताब का हिन्दी अनुवाद पढ़ रहा था...और हालांकि मुझे बचपन से ही किताबों से बहुत लगाव था। यह पुस्तक ब्राजील के लेखक ‘पाओलो कोएलो’ की विश्व प्रसिद्ध रचना हैं और मेरे हिसाब से भी यह एक उत्कृष्ट कृति हैं।...जैसा कि किताब के कवर पेज़ पर लिखा था कि दुनिया की कई प्रमुख भाषाओं में इस किताब का इसका अनुवाद हो चुका हैं...होना भी चाहिए...इतनी महान् रचना हर किसी को बखूबी पढ़ना चाहिए। यह किताब अपने सपनों को साकार करने वाले एक साहसी गड़रीये लड़के की आकर्षक और रोमांचकारी कहानी हैं। वो अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिम्मत जुटाकर सफर पर निकल पड़ता हैं...इस सफ़र में उसे कुछ लोग मिले, जो उसकी मदद करते हैं।...उसे रास्ते में कईं सारी मलोबल को तोड़कर रख देने वाली परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं, पर वह किसी भी स्थिति में हार नहीं मानता और तमाम विपत्तियों और बातों से जूझते हुए अंततः अपने लक्ष्य तक पहुंचता हैं।
‘अल्केमिस्ट’ उन लोगों के लिए बड़ी मददगार साबित हो सकती हैं, जो सच्चे दिल से अपनी नियति को पाने की कोशिश में जुटे रहते हैं...और फिर हर किसी के लिए ये किताब शिक्षाप्रद हैं।...यह किताब भटके हुए युवाओं के लिए अत्यंत तीव्र प्रेरक हैं। तब मैं ‘अल्केमिस्ट’ को कई बार पढ़ चुका और हर बार पढ़ते हुए इसकी उपयोगिता को मैंने बहुत गहराई से महसूस किया था...अभिव्यंजक रूप से अर्थपूर्ण समझा था। मैं इसके प्रभाव से अच्छी तरह वाकिफ हो चुका था और मुझे इसे और पढ़ने की यूं तो कोई जरूरत नहीं थी, पर फिर भी इसे बार–बार पढ़ने की मैं अपनी चाह को कभी खत्म नहीं कर पाया था...ये किताब हमेशा से मेरी पसंदीदा किताबों की श्रृंखला में से एक थी, जो मुझे सर्वथा आकर्षित करती थी।...इसे मैं हमेशा से इत्मीनान से पढ़ता था...वाकई ये लाज़वाब थी !
©SD. @rya


Superb🖤
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