🔸1️⃣7️⃣🔸
Dec.2013 के एक रोज मैं उज्जैन शहर में किसी कॉलोनी में बन रहे मकान के पास से गुजर रहा था...तभी मुझे वहाँ दिखाई दिया कि रेत के बड़े से ढेर पर कुतिया के कुछ छोटे - छोटे प्यारे पिल्ले अड्डा जमाए बैठे हैं ।
उन्हें देखते ही मैं रुक गया और अचानक एक बच्चे की मानिंद नटखट हो गया...मैं खुद को ये बोलने से नहीं रोक पाया कि 'अरे वा कितने क्यूट है आप सभी।'...पर वे मासूम पिल्ले कहां समझ पाते कि कोई उनके प्रति सहानुभूति जता रहा है...।
उस दिन उन छोटे - छोटे पिल्लों को देखकर मुझे अपना बचपन याद आ गया था...जब मैं छोटा बच्चा था तब कुत्तों के बच्चों के साथ खूब खेला करता था...मुझे उनसे बेहद लगाव रहता था...और कईं दफा उन्हें उठाकर मैं अपने घर तक ले आता था...और तब मुझे माँ से बहुत डांट भी खानी पड़ती थी...पर मुझे कहां फर्क पड़ता था...!
और फिर उस दिन जैसे मैं अपनी बचपन की दुनिया में जा चुका था।...मैंने इधर-उधर देखा और अपने आसपास किसी इंसान को ना पाकर झट से एक पिल्ला उठा लिया और उसे सहलाने लगा...मैं उन सभी को अपने बचपन के अंदाज में खिला रहा था...मैं उनसे एक बच्चे की भांति पेश आ रहा था। मैं उनके मुंह के नजदीक अपने चेहरे को ले गया और अपनी नाक से उनका स्पर्श कर उनके प्रति अपना प्रेम जाहिर किया...ये स्पष्ट था कि वे भी मुझसे खुश थे...तभी तो वे सब अपनी दुम हिला - हिला कर अपनी मस्ती जाहिर कर रहे थे, उन्हें कोई ऐतराज नहीं था कि कोई अजनबी उनके बिल्कुल करीब है...वे मुझसे घुलमिल गए थे । और इसी बीच एक पिल्ला आकर मेरे चेहरे को चाटने लगा...मैं उसका दिल नहीं तोड़ना चाहता था और इस लिए अपना चेहरा कुछ देर तक उसके सामने से नहीं हटाया और उसकी इच्छा पूरी कर लेने दी...अहा ! , कितना प्यारा था ये सबकुछ !
मुझे याद है और मैं इसे महसूस कर सकता हूं कि बचपन में पिल्ले मेरे चेहरे को कईं दफा अपनी कोमल जिह्वा से सहलाकर मेरे प्रति अपने असीम मासूम प्यार को प्रदर्शित करते थे।...बच्चा था तब कईं बार उन पिल्लों के नाखून और दाँत लग जाया करते थे और ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं थी क्योंकि हम उन्हें बिना डर के और उनके दांत और नाखूनों की परवाह किए बिना उनके साथ खेला करते थे ।
तो स्पष्ट है कि कई बार उनके दांत और नाखून लगे...पर हम उस वक्त 'रेबीज़' वायरस से बेख़बर अपनी दुनिया में मस्त रहते थे...हमारा कोई ईलाज़ - विलाज़ नहीं करवाया गया और आज हम बच्चों से बड़े हो गये...कोई रेबीज़ वायरस हम पे कुछ असर नहीं कर पाया।
...कहते हैं कि कुत्तों में 'रेबीज़' वंशानुगत होता है...ठीक है होता होगा...हमें उससे क्या..!
उन्हें देखते ही मैं रुक गया और अचानक एक बच्चे की मानिंद नटखट हो गया...मैं खुद को ये बोलने से नहीं रोक पाया कि 'अरे वा कितने क्यूट है आप सभी।'...पर वे मासूम पिल्ले कहां समझ पाते कि कोई उनके प्रति सहानुभूति जता रहा है...।
उस दिन उन छोटे - छोटे पिल्लों को देखकर मुझे अपना बचपन याद आ गया था...जब मैं छोटा बच्चा था तब कुत्तों के बच्चों के साथ खूब खेला करता था...मुझे उनसे बेहद लगाव रहता था...और कईं दफा उन्हें उठाकर मैं अपने घर तक ले आता था...और तब मुझे माँ से बहुत डांट भी खानी पड़ती थी...पर मुझे कहां फर्क पड़ता था...!
और फिर उस दिन जैसे मैं अपनी बचपन की दुनिया में जा चुका था।...मैंने इधर-उधर देखा और अपने आसपास किसी इंसान को ना पाकर झट से एक पिल्ला उठा लिया और उसे सहलाने लगा...मैं उन सभी को अपने बचपन के अंदाज में खिला रहा था...मैं उनसे एक बच्चे की भांति पेश आ रहा था। मैं उनके मुंह के नजदीक अपने चेहरे को ले गया और अपनी नाक से उनका स्पर्श कर उनके प्रति अपना प्रेम जाहिर किया...ये स्पष्ट था कि वे भी मुझसे खुश थे...तभी तो वे सब अपनी दुम हिला - हिला कर अपनी मस्ती जाहिर कर रहे थे, उन्हें कोई ऐतराज नहीं था कि कोई अजनबी उनके बिल्कुल करीब है...वे मुझसे घुलमिल गए थे । और इसी बीच एक पिल्ला आकर मेरे चेहरे को चाटने लगा...मैं उसका दिल नहीं तोड़ना चाहता था और इस लिए अपना चेहरा कुछ देर तक उसके सामने से नहीं हटाया और उसकी इच्छा पूरी कर लेने दी...अहा ! , कितना प्यारा था ये सबकुछ !
मुझे याद है और मैं इसे महसूस कर सकता हूं कि बचपन में पिल्ले मेरे चेहरे को कईं दफा अपनी कोमल जिह्वा से सहलाकर मेरे प्रति अपने असीम मासूम प्यार को प्रदर्शित करते थे।...बच्चा था तब कईं बार उन पिल्लों के नाखून और दाँत लग जाया करते थे और ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं थी क्योंकि हम उन्हें बिना डर के और उनके दांत और नाखूनों की परवाह किए बिना उनके साथ खेला करते थे ।
तो स्पष्ट है कि कई बार उनके दांत और नाखून लगे...पर हम उस वक्त 'रेबीज़' वायरस से बेख़बर अपनी दुनिया में मस्त रहते थे...हमारा कोई ईलाज़ - विलाज़ नहीं करवाया गया और आज हम बच्चों से बड़े हो गये...कोई रेबीज़ वायरस हम पे कुछ असर नहीं कर पाया।
...कहते हैं कि कुत्तों में 'रेबीज़' वंशानुगत होता है...ठीक है होता होगा...हमें उससे क्या..!
©SD. Arya

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