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मेरे जीवन के गुजरे कुछ सुखद क्षण मेरे नन्हे मित्र के साथ

         Note No. ‘19’


                   Jun. 2013, में मुझे एक नायाब दोस्त मिला...वो और कोई नहीं मेरे छोटे मामा का 7-8 वर्षीय लड़का था...और तब मैंने उसे अपना भाई बाद में पहले जिगरी दोस्त माना था...!
                मैं उससे पहले कभी इस तरह नहीं मिला था...बल्कि उसे शायद दो - तीन बार यूंही देखा होगा...क्योंकि मैं अब मामा के घर कम ही जाता था...जबकि मेरे बचपन के अधिकांश दिन वहीं बीते थे...!
                मुझे नहीं पता था कि मुझे एक गोल्डन फ्रेंड मिलने वाला है।बात तब की है जब वो गर्मी की छुट्टियों में अपने गांव उमराझर में अपने घर  था।...और मैं अपने गांव नांदेड़ में अपनी ज़िन्दगी के बोझिल दिन गुजार रहा था। उस वक्त मेरे शिक्षक मामाजी एक दिन मेरे घर पर आये और तब उन्होंने मुझसे उनके साथ चलने को कहा और कहा कि थोड़े दिन वहां रह लेना...तुझे नानी और बाकी सब याद करते है। इतना सुनने के बाद मैंने उनसे तुरंत मना कर दिया और एक बहाना बनाकर कहा था कि मैं अभी नहीं फिर कभी वहां आ जाऊंगा।...पर फिर माँ के बार - बार आग्रह करने पर मैं उनके साथ जाने को तैयार हो गया।
                हालांकि मैं वहां अपनी बोझिल और तनावग्रस्त अवस्था में गया था। रास्ते भर मैं थोड़ा असहज था...पर वहां पहुंचते ही मेरे सारे बोझ और चिंताएं कहीं उड़ सी गई...वहां  कुलदीप जैसा प्यारा दोस्त जो मिल गया था।
                वहां सबकुछ मुझे आश्चर्य से भरा लग रहा था...क्योंकि  उसका बर्ताव ही कुछ आश्चर्यजनक था।जैसे  ही हम गाड़ी से उतरे वो हमारे सामने मौजूद था...तब उसे देख मुझे  ऐसा लगा मानो उसे मेरे आने की पहले से ही खबर थी और वो मेरे आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। वहां पहुंचते ही उसने मुझसे आगे रहके ये बोलकर पहली मुलाक़ात की शुरुआत की थी कि "भईया आ गया तू !" और इसपर जल्दबाजी में, मैं बोल गया था कि "हाँ...और कैसा है तू...!"...उस समय वह बेहद फनी लग रहा था,वह  मेरे साथ इस तरह पेश आ रहा था, जैसे हम दोनों पुराने Best Friend हों। वो मुझसे बिना किसी झिझक के घुल मिल गया था, और ये देख मैं थोड़ा हैरान भी हुआ था।
               मै वहां 08-10 रोज रुका होगा ! और उस वक्त में हम दोनों भाई घनिष्ठ मित्र बन चुके थे...कोई तो शक्ति थी जो तब हम दोनों की दोस्ती को प्रगाढ़ बना रही थी। वह मुझसे कई तरह की बातें और गपशप करता और मैं भी उसके साथ बच्चा बन अपनी विभिन्न बातें व अपनी personal thoughts उससे शेयर करता।उस  समय मेरे पास SAMSUNG कंपनी का स्मार्टफोन था। उसे वीडियो गेम खेलना पसंद था,सो मैं उसके लिए इंटरनेट से तरह- तरह के गेम्स डाउनलोड करता और फिर वो खूब एंजॉय से उन गेम्स को खेलता रहता था।
            मैं तब की उसकी यारी को आज सैल्यूट करता हूं।
            एक रोज मामीजी ने मुझे बताया था कि तुम उसकी जिंदगी में पहले ऐसे लड़के हो जिससे वह इतना घुलमिल कर रह रहा है। वो अपने पास से खाने की चीजें किसी और को देना पसंद नहीं करता था...पर मुझे वो मेरे मना कर देने पर भी अपनी खाने की चीजें देता था...!
             जब कभी हम दोनों साथ में घूमने जाते तो वो मेरा हाथ पकड़कर चलना पसंद करता।…उस छोटे बच्चे में मेरे प्रति इतने गहरे लगाव को देख तब मैं भाव - विभोर हो जाता और अपने दिल में उसकी इस चाहत के लिए उसका शुक्रियादा करता था । उसके साथ बिताए वे पल खूबसरत यादों का हिस्सा बनकर रह गए। हम दोनों का चंद दिनों का वह साथ वाकई खुशनुमा और लाजवाब था।
              और आखिरकार मेरे वापस अपने घर आने का दिन आया...जब  चलने के एक रोज पहले मैंने उसे बताया कि कल मैं यहां से जा रहा हूं,तो  ये सुनकर वह दुःखी हो गया...और  तब उसने मुझसे कहा था कि "भैया तू अभी मत जा ना...कुछ दिन और मेरे पास रुक जा...!", किंतु मैं अब और नहीं रुक सकता था, मैंने उसे समझाया और वहां से चला आया।
               जिस दिन मैं अपने घर आने की तैयारी करने लगा उस दिन वह बहुत उदास था जैसे उसका बहुत कुछ छीन अथवा खो गया हो,जोकि उसे बेहद प्यारा था। वो आज किसी से कुछ बातें नहीं कर रहा था...बस  गुमसुम सा कहीं खोया हुआ था।...और अब मैं वहां से रवाना हो चुका था...वह मुझे जाते हुए तब तक देखता रहा...जब तक कि मैं उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गया...और मैंने भी उसे पलटकर कई बार देखा था ।...तमाम  जिंदगियों में ऐसा होता रहता है, हर मिलने वाले से हर किसी को एक न एक दिन बिछड़ना पड़ता है। तब जाते हुए मैंने नोटिस किया था कि वो मुझसे बहुत गुस्सा है,ठीक उसी तरह जैसे कोई अपने किसी प्रिय व्यक्ति से रूठ जाता है...मानो वो मुझसे दिल ही दिल में शिकायत कर रहा हो कि तू मुझे ऐसे ही छोड़कर कैसे जा सकता है...और इस तरह की भावना में असीम प्यार छुपा होता हैं।
                चूंकि अब मैं अपने पैतृक गांव आ चुका था...ऐसा गांव जिसने मुझे दर्द के सिवा कुछ नहीं दिया।आज  मुझे यहां अच्छा नहीं लग रहा था...मुझे भी उसकी याद आ रही थी...पर मैंने कभी जताया नहीं था...मैं भी उसे बेहद मिस कर रहा था।
                  ...और उसी दिन देर शाम को मामीजी का कॉल आया, वो कह रही थी कि,' कुलदीप तुम्हारे लिए रो रहा है और तुम्हारे पास आने की ज़िद कर रहा है।'...वह मेरे लिए रो रहा है, ये सुनते ही बिना देरी किए मेरी आंखों से भी आंसू की कुछ बूंदें निकलकर जमीं पर गिर चुकी थी...क्या  करूं मैं कुछ ऐसा ही हूं।...तब  मैंने महसूस किया था,' आखिर मेरे प्रति उसके अगाध प्रेम का सुप्त ज्वालामुखी फट ही गया।' मामीजी ने आगे कहा कि हम सुबह इसे तुम्हारे पास छोड़ने आ रहें हैं...कुछ दिन तुम्हारे साथ रह लेगा तो समझ जाएगा...और उन्होंने फोन पर मेरी उससे बात भी करवाई...उसने  मुझसे कहा कि "भईया मुझे तेरी याद आ रही हैं और मैं तेरे पास आ रहा हूं, तू कहीं जाना मत !"...मैंने उससे कहा कि ठीक है तू कल मेरे पास आजा ।
                       और अगले दिन वो मेरे पास था...और  फिर कुछ दिनों तक हम दोनों साथ - साथ रहे थे ।
                         वह शायद पहला शख्स था जो मेरे लिए रोया था...नहीं  तो इस दुनिया में मेरी "मां" के अलावा और कोई कहां होगा जो मेरे लिए भी आंसू बहा दे।...मुझे उसके इस समर्पण और यारी का खयाल ताउम्र रहेगा...!!
                                          
                                            ©SD. Arya

             

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