मेरी खुशहाल और सामान्य सी ज़िन्दगी में अवसादी समस्याओं,बेवजह की चिंताओं और अप्राकृतिक विरोधाभासों ने तब दस्तक दी थी जब मैं कक्षा 09 में पढ़ता था । उस समय मैं अति तनावपूर्ण बोझिल जीवन जीने लगा था...! मैं व्यर्थ के झंजावातों में उलझने लगा था और स्कूल की पढ़ाई से मेरी दिलचस्पी धीरे - धीरे खत्म हो रही थी...कोर्स की किताबों को देखकर एक उब सी उठने लगी थी...गजब विडंबना थी जिस लड़के को पढ़ाई से बेहद प्यार था उससे वो आज जुदा होने लगा था...!
क्लास 8 तक मेरा प्रदर्शन बेहतर था फिर धीरे धीरे मैं पढ़ाई से दूर होने लगा ।मैं दिन पर दिन पढ़ाई के प्रति अति लापरवाह होता जा रहा था...।
और ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा था...ये सबकुछ उस वक्त मेरी समझ के बाहर था।...कोई भयानक विध्वंशकारी तूफान आया था,जिसने बिन बताये मेरी ज़िंदगी में दस्तक दी...और मेरा बहुत कुछ तबाह कर गया...हाँ बिल्कुल मैं अपना बहुत कुछ और कीमती कितना ही कुछ खो चुका था, जिसका अधूरापन और उसे फिर से ना हासिल कर पाने का दर्द मुझे सालता रहेगा।
मैं सबके सामने स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरी मानसिक परेशानी बहुत खतरनाक थी, जो सहनशीलता के विभिन्न आयामों के बस के बाहर और सह पाने की अनेकों रीतियों के विपरीत ,किसी भी तरह से सहन करने के लिए सही नहीं थी...पर मैंने उस विकट व्याधि के दर्द को भी बर्दाश्त किया हैं।
ये परेशानी मेरे दुस्साहस का भी परिणाम थी।ये व्यथा मेरे लिये अत्यंत कष्टकारी थी...और मैं कई दफा ये भी सोचा करता था कि ये दर्दनाक तकलीफें मेरे साथ क्यों हैं...मैं इनको बेवजह क्यों सहता हूं...! और भी कई सवाल मेरे अंदर उठते रहते थे पर इतना जल्दी मैं कहां और कैसे किसी वांछित परिणाम पर पहुँचने वाला था...?
मुझे ये अच्छी तरह विदित था कि मेरी समस्या का हल शायद ही किसी के पास हो और मुझे ही इससे उबरना है...फिर भी मैं चाहता था कि इस तकलीफ में कोई मेरे साथ हो और मुझे ढांढस बंधाये, मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में मेरी मदद करें...लेकिन इस बहुत बड़ी दुनिया में मुझे कभी कोई ऐसा शख़्स नहीं मिला जो मेरी स्थिति को जरा सा भी भांपकर मेरी मदद के लिए आगे हाथ बढ़ाता।उस वक्त मुझे किसी ऐसे इंसान अथवा मित्र की जरुरत थी, जो मेरे लिये एक सच्चे पथप्रदर्शक का काम करता, पर अफ़सोस...!
ये वक्त मेरे लिए बेहद मुश्किल भरा रहा था,जिसमें मेरी ज़िन्दगी अनसुलझे प्रहारों से आहत हो चुकी थी, मेरी उम्मीदें टूट चुकी थी, आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती थी...फिर भी मैं उन विकट-विषम-विरोधाभासों के विरुद्ध डटा रहा और खुद को कभी पूर्णतः नहीं टूटने दिया।सचमुच मेरी स्थिति अत्यधिक लाचार, बेबस, मजबूर और दयनीय हो चुकी थी...पर मैंने कभी हार नहीं मानी। मैं हमेशा सोचा करता था कि " मैं कुछ हूँ, मेरे होने के कुछ मायने हैं और मुझे अपनी इस जिंदगी में कुछ अच्छा बहुत अच्छा करना हैं। "...और अपनी इस गतिशील सोंच के साथ मैं आगे बढ़ता गया और खुद को बचा लिया।
©SD. Arya
क्लास 8 तक मेरा प्रदर्शन बेहतर था फिर धीरे धीरे मैं पढ़ाई से दूर होने लगा ।मैं दिन पर दिन पढ़ाई के प्रति अति लापरवाह होता जा रहा था...।
और ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा था...ये सबकुछ उस वक्त मेरी समझ के बाहर था।...कोई भयानक विध्वंशकारी तूफान आया था,जिसने बिन बताये मेरी ज़िंदगी में दस्तक दी...और मेरा बहुत कुछ तबाह कर गया...हाँ बिल्कुल मैं अपना बहुत कुछ और कीमती कितना ही कुछ खो चुका था, जिसका अधूरापन और उसे फिर से ना हासिल कर पाने का दर्द मुझे सालता रहेगा।
मैं सबके सामने स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरी मानसिक परेशानी बहुत खतरनाक थी, जो सहनशीलता के विभिन्न आयामों के बस के बाहर और सह पाने की अनेकों रीतियों के विपरीत ,किसी भी तरह से सहन करने के लिए सही नहीं थी...पर मैंने उस विकट व्याधि के दर्द को भी बर्दाश्त किया हैं।
ये परेशानी मेरे दुस्साहस का भी परिणाम थी।ये व्यथा मेरे लिये अत्यंत कष्टकारी थी...और मैं कई दफा ये भी सोचा करता था कि ये दर्दनाक तकलीफें मेरे साथ क्यों हैं...मैं इनको बेवजह क्यों सहता हूं...! और भी कई सवाल मेरे अंदर उठते रहते थे पर इतना जल्दी मैं कहां और कैसे किसी वांछित परिणाम पर पहुँचने वाला था...?
मुझे ये अच्छी तरह विदित था कि मेरी समस्या का हल शायद ही किसी के पास हो और मुझे ही इससे उबरना है...फिर भी मैं चाहता था कि इस तकलीफ में कोई मेरे साथ हो और मुझे ढांढस बंधाये, मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में मेरी मदद करें...लेकिन इस बहुत बड़ी दुनिया में मुझे कभी कोई ऐसा शख़्स नहीं मिला जो मेरी स्थिति को जरा सा भी भांपकर मेरी मदद के लिए आगे हाथ बढ़ाता।उस वक्त मुझे किसी ऐसे इंसान अथवा मित्र की जरुरत थी, जो मेरे लिये एक सच्चे पथप्रदर्शक का काम करता, पर अफ़सोस...!
ये वक्त मेरे लिए बेहद मुश्किल भरा रहा था,जिसमें मेरी ज़िन्दगी अनसुलझे प्रहारों से आहत हो चुकी थी, मेरी उम्मीदें टूट चुकी थी, आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती थी...फिर भी मैं उन विकट-विषम-विरोधाभासों के विरुद्ध डटा रहा और खुद को कभी पूर्णतः नहीं टूटने दिया।सचमुच मेरी स्थिति अत्यधिक लाचार, बेबस, मजबूर और दयनीय हो चुकी थी...पर मैंने कभी हार नहीं मानी। मैं हमेशा सोचा करता था कि " मैं कुछ हूँ, मेरे होने के कुछ मायने हैं और मुझे अपनी इस जिंदगी में कुछ अच्छा बहुत अच्छा करना हैं। "...और अपनी इस गतिशील सोंच के साथ मैं आगे बढ़ता गया और खुद को बचा लिया।
©SD. Arya

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