"मेरे पिता आर्थिक मामलों में कभी आगे नहीं बढ़ पाए... उन्होंने अपनी तमाम उम्र अभावों में रहकर ही गुजार दी थी"
Note No. 104
शायद मुझे अच्छे से तो याद नहीं... हां मगर फिर भी मुझे बहुत कुछ याद हैं । ... मसला ये था कि मेरी मां मेरे पिताजी से उनके आर्थिक अभावों और उनकी नाकामियों को लेकर अक्सर शिकायतें करती रहती थी । ... और ये स्थिति मेरे जन्म के पूर्व और अधिक बलवती होगी... इसमें कोई संदेह नहीं !
मुझे याद हैं... मां, पिताजी से अधिकांश मौकों पर आर्थिक तंगी को लेकर झगड़ती रहती थी और मेरे पिताजी हमेशा की तरह मां को झूठी सांत्वना दिया करते थे कि सबकुछ ठीक हो जायेगा...वो कहते...कोई न कोई रास्ता या समाधान निकल ही जाएगा...। मगर मेरी मां को शायद ये अच्छे से विदित था कि मेरे पिता के माध्यम से कभी कोई हल नहीं निकलने वाला था । Campus Men's CESTER (N) Running Shoes https://amzn.eu/d/5G9qL2x
मेरे पिता कभी पैसों के मामले में प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाए...उन्होंने अपनी तमाम उम्र आर्थिक अभावों में रहकर ही गुजार दी । और इस तरह कभी भी उनकी ज़िंदगी में उनके पास जरूरत के मुताबिक पैसा नहीं रहा । ...जबकि मेरी मां हमारे अच्छे भरण – पोषण के लिए औरों के खेतों और घरों में काम किया किया करती थी । उसने हमें सरकारी स्कूलों में अच्छी शिक्षा के आभाव के चलते...अपेक्षाकृत संतोषजनक शिक्षा प्रदाय करने में सक्षम निजी स्कूलों की फीस भरकर वहां पढ़ाया । मुझे ज्यादा कुछ तो याद नहीं और ना ही मैं उन बातों से परिचित हूं कि उसने अपनी ज़िंदगी में न जाने किस – किस तरह के मुश्किल और तकलीफों से भरे हालातों का सामना किया होगा... हां मगर मैं अपनी सूझ – समझ, अनुभव से हालातों के मद्देनजर अनुमान स्वरूप ये ज़रूर कह सकता हूं कि उसने हमारे लिए काफ़ी कुछ सहा और बहुत से काम किए हैं...वो किसी का भी और किसी भी तरह का कुछ भी काम बिना किसी झिझक के और शर्म के चंद पैसों को पाने की चाह में कर दिया करती थी... क्योंकि तब उन चंद पैसों को पाने की चाहत, उसके जीवन से जुड़े बदतर हालातों के मुताबिक बेहद मायने रखती थी ।
मां और बाबूजी के बीच शुरू हुआ वो आपसी मतभेद का सिलसिला ताउम्र जारी रहा... हरेक छोटी – छोटी बातों पर वे झगड़ते रहते थे । ऐसा कोई दिन नहीं जाता था, जिसमें कि वो दोनों एक – दूसरे से झगड़ते ना थे...मगर अब वक्त का एक लंबा अरसा गुजर जाने के बाद कालांतर में उनके झगड़े का स्वरूप बदल चुका था...अब पहले की तरह आरोप – प्रत्यारोप और दोषारोपण नहीं होता था । ... पहले मां के शब्दों और भावों में पिताजी के प्रति हमेशा विरोध और आवेश होता था... लेकिन अब उसके लहजे में विनम्रता और कोमलता आ चुकी थी । हर दिन के झगड़ों के बावजूद उनमें एक अलग ही तरह का आपसी और प्रगाढ़ प्रेम था । वे एक पल लड़ते – झगड़ते और दूसरे ही पल में एक हो जाते थे... हालांकि अमूमन इस तरह का आपसी मतभेद अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था...और इस तकरार में भी उनके खूबसूरत – से रिश्ते की मधुरता भी निहित थी ।
©SD. Arya

मित्र,
जवाब देंहटाएंसुदर्शन!
भावनाओं और विचारों को शब्दों में ढालने का कौशल तुममें विकसित है। सृजनात्मक लेखन ,शीघ्र शुरू कर दो।
जी धन्यवाद!🙏🏼
हटाएंApne bahut Sahi likha hai
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