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मेरी डायरी का सबसे कठिन फैसला: जब मैंने खुद को चुना

Note No. 122

वह दिन जब सब कुछ स्पष्ट हो गया

जीवन में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन्हें लेना आसान नहीं होता।

दिल कुछ और कहता है और दिमाग कुछ और।

मेरी डायरी के उस पन्ने पर मैंने लिखा था—

"कभी-कभी सबसे मुश्किल काम यह होता है कि हम उस चीज़ को छोड़ दें जिसे हम सबसे ज्यादा चाहते हैं।"

उस दिन मुझे समझ आ गया था कि अब मुझे एक फैसला लेना होगा।

रिश्ते और समझौते

रिश्ते निभाने के लिए समझौता करना बुरी बात नहीं है।

लेकिन जब समझौते आपकी खुशियों को ही खत्म करने लगें,

तो वहाँ रुककर सोचना जरूरी हो जाता है।

मैंने बहुत कोशिश की कि सब ठीक हो जाए।

मैंने खुद को समझाया, समय दिया, उम्मीद भी रखी।

लेकिन कभी-कभी सच यह होता है कि कुछ चीजें ठीक नहीं हो पातीं।

खुद को खो देना

धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि मैं दूसरों को खुश रखने की कोशिश में खुद को ही खोता जा रहा हूँ।

मेरी मुस्कान बनावटी हो गई थी।

मेरी बातें कम हो गई थीं।

और शायद मेरी खुशी भी कहीं पीछे छूट गई थी।

उस रात मैंने अपनी डायरी में लिखा—

"अगर खुद को बचाने के लिए किसी को छोड़ना पड़े,

तो यह स्वार्थ नहीं… आत्मसम्मान होता है।"

वह फैसला

आखिरकार मैंने फैसला लिया कि अब मुझे खुद को चुनना होगा।

यह फैसला आसान नहीं था।


दिल में दर्द था, यादें थीं, और कई सवाल भी थे।

लेकिन कहीं न कहीं भीतर एक शांति भी थी —

जैसे मैंने अपने आप से एक सच्चा वादा किया हो।

आज जब पीछे देखता हूँ

आज जब मैं उस समय को याद करता हूँ,

तो समझ आता है कि वह फैसला सही था।

क्योंकि अगर उस दिन मैंने खुद को नहीं चुना होता,

तो शायद आज मैं खुद को पहचान भी नहीं पाता।

पाठकों के लिए

अगर आप भी ऐसी स्थिति में हैं जहाँ आपको खुद और दूसरों में से किसी एक को चुनना पड़ रहा है,

तो याद रखिए —

आपकी खुशी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी और की।

मेरी डायरी की आखिरी पंक्ति

उस दिन मैंने अपनी डायरी में लिखा—

"कभी-कभी जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए किसी को छोड़ना नहीं,

बल्कि खुद को वापस पाना जरूरी होता है।"

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