05 .Note No
मुझे ख़ामोश रहना पसंद था...क्योंकि मैं कभी व्यर्थ की बातों में शामिल नहीं हो सकता था... हरगिज़ नहीं !
जिन शब्दों या बातों का कोई मतलब नहीं...उन्हें क्योंकर बोला जाए और उनमें शरीक हुआ जाए...मुझे उन्हीं लोगों से बातें करना पसंद था, जिनकी बातें दिल को छूती थी और जिनकी आवाज में एक गजब की कशिश होती थी।
वाकई उनके साथ बातचीत करना मुझे दिलचस्प लगता था...ऎसे व्यक्ति मेरे हिसाब से सच्चे इंसान होते हैं...जो औरों की भावनाओं को बखूबी समझते हैं और उनकी कद्र करते हैं...वो लाजवाब होते हैं !
©SD. Arya
