Diary Series – “पिताजी कहा करते थे”
“NOTE NO. 115”
N⁴ : कहानियों की वह विरासत
पिताजी मुझे सिर्फ कहानियाँ नहीं सुनाते थे, वे मेरे भीतर एक पूरी दुनिया बसा देते थे।
कभी शरारती बंदर की उछल-कूद, कभी धैर्यवान कछुए की धीमी मगर दृढ़ चाल, कभी सारस की सरलता, तो कभी तोते-मैना की चहकती दोस्ती—उनकी हर कहानी मेरे मन के आँगन में जीवंत हो उठती थी।
चालाक लोमड़ी की चतुराई, सियार की कपट भरी हँसी, शेर का स्वाभिमान, कौए की सूझबूझ और गधे की भोली मूर्खता—इन सबके माध्यम से वे जीवन के गहरे सत्य बहुत सहजता से समझा देते थे। मुझे तब एहसास नहीं था कि वे सिर्फ किस्से नहीं सुना रहे, बल्कि मेरे व्यक्तित्व की नींव गढ़ रहे थे।
उनका कहानी सुनाने का अंदाज़ इतना प्रभावशाली था कि हर पात्र की आवाज़ अलग होती, हर दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता। कभी वे धीमे स्वर में रहस्य रचते, कभी अचानक ऊँची आवाज़ में मोड़ ला देते—और मैं मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहता।
और जब कभी उनका मन कहानी सुनाने का नहीं होता, तो मेरी जिद शुरू हो जाती। मैं उनके पास जाकर बैठ जाता, उनका हाथ पकड़ लेता और कहता—“बस एक कहानी और…”
शायद वे मेरी उस मासूम ज़िद में अपना बचपन देख लेते थे, इसलिए अंततः मुस्कुराकर कहानी शुरू कर ही देते थे।
आज समझ में आता है, वे कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं थीं—वह मेरे जीवन की पहली पाठशाला थीं, और पिताजी मेरे पहले गुरु।
– SD. Arya

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