Note No. 114
N³ “स्नेह की छाया”
मैं बचपन में बहुत मस्तीखोर और शरारती था। घर की दीवारें मेरी शरारतों की गवाह हैं — कभी कुछ तोड़ देना, कभी पढ़ाई से भाग जाना, कभी बिना वजह उधम मचा देना। लेकिन इन सबके बावजूद एक बात आज भी मुझे भीतर तक छू जाती है — पिताजी ने मुझे कभी नहीं पीटा।...सिर्फ़ उनका ही थप्पड़ मुझे याद हैं ।
वे मार में विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि बच्चे को डर से नहीं, प्रेम से सँवारा जाता है। जब भी मैं कोई गलती करता, वे गुस्से की जगह मुस्कान के साथ कहते —
“गलती से सीखो, डर से नहीं।”
उनकी आवाज़ में डाँट कम और विश्वास अधिक होता था। जैसे वे कह रहे हों — “मुझे पता है, तुम सुधर जाओगे।”
इसके विपरीत माँ बहुत सख़्त थीं। मेरी मस्ती या कोई बिगड़ा हुआ काम उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था। उनकी मार कभी-कभी सचमुच भयंकर लगती थी। उस समय आँसू भी आते थे और शिकायत भी होती थी। पर आज समझ आता है — उस मार में भी उनका असीम वात्सल्य छिपा था। वह मार नहीं, मेरी दिशा सुधारने की उनकी बेचैन कोशिश थी।
कई बार जब माँ का गुस्सा अपने चरम पर होता, तब पिताजी बीच में आकर मुझे बचा लेते। वे ढाल बन जाते थे। उनकी आँखों में करुणा और चेहरे पर सादगी रहती। वे सचमुच बेहद दयालु किस्म के इंसान थे — सीधे, सरल और भीतर से बेहद कोमल।
पिताजी की एक आदत मुझे आज भी याद है — वे कभी खाली हाथ घर नहीं आते थे। बाहर से लौटते तो मेरे लिए कुछ न कुछ जरूर लाते। जैसे ही दरवाज़े पर उनकी आहट होती, मैं दौड़कर उनके पास पहुँच जाता। मेरी आँखों में उत्सुकता होती — “आज क्या लाए होंगे?”
खाने की कईं चीजों के अलावा, अक्सर वे दुकान से मावे के मीठे पेड़े और जलेबी लाते थे। वह मिठास सिर्फ स्वाद में नहीं थी, उसमें उनका प्यार घुला होता था। उन पेड़ों की खुशबू और जलेबी की चाशनी आज भी मेरे जेहन में ताज़ा है। समय बीत गया, स्वाद बदल गए, मगर वह एहसास आज भी वैसा ही है।
शायद इसलिए पिताजी माँ से कहा करते थे —
“बच्चे को प्यार दो, वह खुद-ब-खुद सही रास्ता चुन लेगा।”
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि उन्होंने मुझे केवल मिठाइयाँ नहीं दीं — उन्होंने मुझे भरोसा दिया, अपनापन दिया, और यह यकीन दिया कि घर में एक व्यक्ति ऐसा है, जो हर हाल में तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।
उनका वह स्नेह आज भी मेरी स्मृतियों में मीठे पेड़ों की तरह घुला हुआ है।
— SD. Arya

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