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कितना अजीब है...कि किसी कार्य क्षेत्र विशेष में वे लोग जो तुम्हारे गिर्द रहते हैं...वे अंतर्मन से कभी तुम्हारे नहीं होते...वे अनचाहे ही तुमसे बेवजह ईर्ष्या भाव रखते हैं । वे तुम्हें चाहने का ढोंग अदा करते हैं, तुम्हारे करीब रहके एक सूखी व बनावटी हंसी हंसते हैं...और इस प्रकार वो कभी नहीं चाहते कि तुम अपने असल मकसदों को पूरा कर सको...वे बाधा बनकर तुम्हें गिराने की ताक में हमेशा तत्पर रहते हैं ।
चूंकि तुम सच्चाई की राह पर निरंतर अग्रसर हो तथा तुम्हारे प्रति उनका इस तरह का बर्ताव अथवा व्यवहार किसी भी तरह उचित नहीं हैं...तुम्हारे साथ ऐसा रवैया अपनाकर वे स्वयं को दोष युक्त बना रहे हैं और उनका ये प्रकृति-विरूद्ध अप्राकृतिक आचरण साबित होता हैं, जिसका भुगतान उन्हें एक न एक दिन सृष्टि के नियमों के मुताबिक अवश्य ही करना पड़ता हैं ।
©SD. Arya

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