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पिता कठोर हो सकता हैं लेकिन उनका प्यार हमेशा कोमल और सौम्य होता है, जो अदृश्य है।

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             ' पिता ' , हमारी जर्जर हो चुकी जिंदगी का वो सख्त सहारा होता हैं, जो लगता तो बड़ा ही कटु और कष्ट कारक हैं, पर उसी कटुता में हमारा पक्ष और उत्थान निहित रहता हैं। हमें उसका मूल्य तब समझ नहीं आता, और उनकी वो सख्ती दुःखदायी ही लगती हैं।
              जब पिता को लगता हैं कि उसका बेटा राह से भटक रहा हैं, तब वह अपने दायित्व को अदा करता है और अपने बेटे को सही पथ पर लाने के लिए विविध, अप्रत्यक्ष और अनन्य प्रयासों में जुट जाता हैं। वो तब भी अपने पुत्र से उतना ही प्यार करता हैं, जितना कि वह हमेशा से करता आया था...मगर अब वो पुत्र के प्रति अपने प्यार को जाहिर नहीं कर पाता हैं...वो उसकी फिक्र करता हैं, उसके बारे में सोचता रहता हैं, उसमें अपने सपनों को साकार होता हुआ देखना चाहता हैं तथा वह चाहता हैं कि तुम अपने हिस्से की तमाम उपलब्धियों को हासिल करो और इस तरह वो तुम्हें लेकर अक्सर परेशान - सा रहता हैं।...एक पिता अपने भटके हुए पुत्र को सही दिशा की ओर लाने हेतु कठोर - सा दिखने वाला तरीका चुनता है, जिसे पुत्र गलतफहमी के वशीभूत अपने लिए प्रताड़ना या अवांछनीय व्यवहार समझने की भूल कर बैठता है...जबकि वहां पुत्र का वास्तविक हित छुपा रहता हैं, जो होकर भी अदृश्य होता हैं ।
                                           
                            ©Sudarshan Arya

टिप्पणियाँ


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