Note No. '107'
रोज की तरह लड़का मजदूर सराय से अजनबी जगह पर काम पर गया था...ये वही लड़का था, जिसने बेतरबी से कईं सारे ख़्वाब संजोए थे, जिन्हें वो बड़ी ही निष्ठा और लगन से पूरा करना करने की फेहरिस्त में लग भी गया था...लेकिन एक भयानक हादसा उसकी जिंदगी में तूफान बनकर आया था और उसका बहुत कुछ तबाह करके चला गया...दुर्भाग्य लड़के का, जो आज मजदूर सराय पर खड़ा था...! लड़का जिस जगह पर उस दिन काम पर गया था...वहां पास ही एक खंडहर हो चुका घर था...लड़के ने उस घर को देखा और सोच में डूब गया...अपनी यादों में बहुत पीछे जाकर बचपन के खुशनुमा पलों को महसूस करने लगा !...उसने महसूस किया, "ये उसी का तो घर हैं", वो उस से बहुत जुड़कर रहती थी...ज्यादातर उसी के साथ रहना उसे पसंद था...लड़का कहीं भी होता, वो उसे ढूंढ लेती थी...उसके बिना उसे रहना कभी रास नहीं आता था...खैर पूरी कहानी यहां नहीं ! उसने खंडहर हो चुके दो मंजिला घर का जायजा लिया...लड़का थम सा गया था...खंडहर हो चुके घर ने उसे सम्मोहित कर लिया था...बचपन के बहुत से दिन उसने, उसके इस घर में उसके साथ गुजारे थे...बहुत बार उसकी मां के हाथों बना खाना उसने उसके घर उसके साथ बैठकर खाया था...लड़के ने उस घर में उसकी आहट को जादुई तौर पर महसूस किया, उसे लगा मानो उसकी आवाज़ इस विरान टूटे घर में कहीं गूंज रही हैं...यकायक कारीगर की आवाज़ लड़के के कानों में पड़ी...और वो यादों के एहसासी ख्वाब से बहाल हुआ...लड़के ने कहा, "हूं...जी, लघुशंका से होकर अभी आया ।" निहायत ही खंडहरों में एक अलग और अनुभूति पूर्ण तत्वरूप आकर्षण होता हैं...बहुत से रहस्य दबे सहमे होते हैं...अनसुलझे अनछुए से पहलू होते हैं...!...खंडहरों में बहुत कुछ छुआ जा सकता हैं...छूने वाला चाहिए ! कारीगर की आवाज़ फिर से उसके कानों में कर्कश बनकर पड़ती हैं...लड़का अभी तक वहीं था...कारीगर की बेरूखी आवाज़ सुनकर वो जल्दबाजी में वहां से हटता हैं...बेसुधी में उसे खंडहर में पड़े मलबे से ठोकर लगती हैं...चूंकि लड़के ने चप्पल पहन रखी थी, उसे चोट लगती हैं, उसके पैर की उंगली से थोड़ा खून निकल आया था...लहू देखकर वो मुस्करा देता हैं...लड़के के लिए ये एक अच्छा संकेत था...!...पर ये संकेत सिर्फ लड़के के साफदिल होने के सुकून के अहसास भर के लिए था, जिसमें कि वो ख़ुद में फक्र महसूस कर सके...वास्तव में अब इस संकेत के होने का कोई अन्यत्र अर्थ नहीं था !
©SD. Arya

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