सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वो मुझसे नाराज़ था...और उसके शब्दों में, मेरे प्रति नाराजगी और शिकायत स्पष्ट थी

            #@rticle No. '55'

     


 

     मैंने ये कभी नहीं सोंचा था कि मेरे माता - पिता, भाई और बहन के अलावा कोई अन्य व्यक्ति भी मुझसे उम्मीद रख सकता हैं!...हाँ वो मेरा करीबी घनिष्ठ मित्र था जिसका मैं यहाँ नाम नहीं लेना चाहूँगा...दोस्ती में लगाव और घनिष्ठता कब बढ़ जाती हैं, हमें पता ही नहीं चलता!...हालांकि मुझे पता था कि वो मेरा एक अच्छा दोस्त हैं, पर कभी लगा नहीं कि वो सच में मुझसे वास्तविक उम्मीदें रखता होगा या फिर मुझपे भरोसा करता हो और शायद साथ ही थोड़ी फ़िक्र भी!

                  एक दिन उसका मेरे पास फोन कॉल आता हैं...कॉल पर वह कहता हैं, कि -  "तू अपनी जिंदगी बस ऐसे ही बिना किसी उद्देश्य के जी भाई...कुछ मत कर...जब तुझे रहने को घर और खाने को भरपूर खाना मिल रहा हैं, तो फिर काम क्यों करना...बस यूँही एन्जॉय करो और मस्त रहो...बिना किसी लक्ष्य के।...क्योंकि तुझे तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तेरे  माता - पिता, भाई-बहन और आखिरकार मुझे भी तुझसे कितनी उम्मीदें थी, उनका क्या होगा।"...मैं चुपचाप सुनता रहा...वो मुझसे खफ़ा - सा था और उसके शब्दों में मेरे प्रति नाराजगी और शिकायत स्पष्ट झलक रही थी।वो आगे बोलता गया और कहने लगा कि - "शायद तू ये भूल गया कि हम दोनों ने साथ बैठकर कितनी बड़ी-बड़ी बातें की थी, कितने बड़े हमारे सपने हुआ करते थे और न जाने कितने ही बड़े वादे किये थे हम दोनों ने...पर हाँ तुझे इन सब बातों से अब क्या फर्क पड़ता हैं, तू तो ये सब भूल चुका होगा!"

                    मैं अब भी सुन रहा था और उसका बोलना जारी था...उसने कहा,- "चाहे जो हो मुझे, तुझपर हमेशा से यकीन था कि तू कुछ अच्छा और बड़ा जरूर करेगा और एक मिसाल कायम करेगा, पर शायद मैं गलत था, जो तुझसे उम्मीद लगा बैठा...मेरा तेरे प्रति वो यकीन अब ख़त्म होने लगा हैं...तुझपर से भरोसा उठने लगा हैं...अब तू जिंदगी में कुछ हासिल करेगा, इसपर संदेह होने लगा हैं।एक दिन था जब तुझपर मेरा अटूट भरोसा और नाज था, मैं तुझसे बहुत उम्मीदें रखता था, पर अफ़सोस अब ये सब ख़त्म-सा हो गया हैं!"...और आगे उसने आखिर में कहा कि इन सब बातों से तुझे कहाँ फ़र्क पड़ने वाला हैं, तू तो अपनी ही एक अलग दुनिया में व्यस्त और मस्त हैं।

                  ...तो कुछ इस तरह की उसकी, मुझसे बोली गयी या कही गई बातें थी...पूरे वक्त मैं उसकी बातें सुनता रहा...मैंने बीच में अपनी तरफ से कोई सफाई नहीं दी थी...देता भी कैसे, वाक़ई मैं अपनी जगह गलत और नाकाम था सचमुच मैं एक निराश और नाकामयाब इंसान था और मेरे प्रति उसकी नाराज़गी जायज़ थी।

                     मुझे आश्चर्य इस बात का था कि कोई मुझसे इस हद तक उम्मीदें कैसे रख सकता हैं?!...मेरे प्रति उसकी अपनेपन से भरी शिकायत, जिसमें अंदर कहीं न कहीं मर्मानुभूति भी निहित रहती हैं, कुछ जाने-अनजाने में उसकी सच्ची मित्रता का परिचय दे गई...और हाँ यकीनन मैंने महसूस किया था कि उस दिन उसने मुझसे जो भी कहा था, उसमें वास्तव में हृदयस्पर्शी दर्द था।

                     आज मेरे उस मित्र ने मुझे एक नया सबक दिया था, जिसका मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था...शायद कुछ बातें हम कहीं भी और कभी भी नहीं सीख सकते...हम उन्हें तभी जान अथवा समझ सकते हैं, जब हम खुद उनसे रूबरू होते हैं!

                       उसकी बातों ने मुझे उस दिन कुछ सोचने पर मजबूर किया था...उसके शब्द मेरे अंतर्मन में किसी अपनों की हितकारी फटकार की भाँति गूँज रहे थे।

                         मैं उसकी दोस्ती की कद्र करता हूँ और संकेत करता हूँ कि अगर सबकुछ सही रहा तो...वादा रहा!...सबकुछ ठीक कर दूँगा...मैं उसकी उम्मीदों और विश्वास को कभी ध्वस्त नहीं होने दूँगा...कभी नहीं!!

                                                                 

                                              ©sd. arya

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक शिक्षक, जिसने जीवन पढ़ाया !

                                                Note No. '42'                                अपने गाँव से कक्षा पाँचवीं (जिला बोर्ड) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरा चयन संभाग स्तरीय शासकीय प्रतिभावान आवासीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, उज्जैन में हुआ। यह चयन मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़ था—एक ऐसा मोड़, जहाँ उत्साह से अधिक अनजानी आशंकाएँ मेरा इंतज़ार कर रही थीं। जब मैं पहली बार उस विद्यालय परिसर में पहुँचा, तो सबकुछ अपरिचित और कुछ हद तक वियोजित-सा लगा। नया स्कूल, नए शिक्षक, नए चेहरे और एक बिल्कुल अलग वातावरण—मानो मैं अपने परिचित संसार से अचानक बहुत दूर आ गया हूँ। मुझे वहाँ छोड़ने मेरे बड़े भाई आए थे। जब तक वे मेरे साथ रहे, तब तक मैं स्वयं को संभाले रहा; लेकिन जैसे ही वे लौटे, मेरे भीतर का साहस जैसे उनके साथ ही चला गया। उस रात मैं सो नहीं पाया। मैंने तकिए को अपने चेहरे से सटा लिया और चुपच...

🪷स्मृतियों में जीवित एक गुरू🪷

                                     “Note No. 111”             डॉ. खत्री सर का मैं अत्यंत प्रिय शिष्य था। चूंकि मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई को अस्त-व्यस्त कर लिया था, इस कारण एक बार उन्होंने आक्रोश में मुझे कठोर दंड दिया। उससे पूर्व उन्होंने किसी भी कारण मुझे कभी नहीं पीटा था—क्योंकि मैंने कभी उन्हें वैसा अवसर ही नहीं दिया था। पर वह प्रहार क्रोध का नहीं, असीम स्नेह का परिणाम था। वह दंड एक ऐसे गुरु का उत्तरदायित्व था, जो अपने प्रिय शिष्य को पतन की ओर जाते देखकर मौन नहीं रह सकता। वह दंड साधारण नहीं था—वह शिष्य के लिए संजीवनी बूटी था, जीवनदायी, चेतना जगाने वाला। डॉ. जी.डी. खत्री जैसे शिक्षक सदियों में विरले ही जन्म लेते हैं। ऐसे व्यक्तित्व किसी कालखंड की संपत्ति नहीं होते, वे युग की चेतना बन जाते हैं—इसीलिए उन्हें हम सदी के महानायक कहते हैं। उनका व्यक्तित्व असाधारण था, गरिमा और करुणा का अद्भुत संगम। वे लाजवाब थे। और यह मेरा ही दुर्भाग्य रहा कि मैं उनके उत्तम व्यक्तित्व ...

मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता

                     Note No. “108”                          यह एक गहरी और भावनात्मक भावना से भरी हुई विचारधारा का वर्णन हैं...सच्ची मोहब्बत में कभी विकल्प नहीं होता, और अगर विकल्प हुआ, तो फिर वो मोहब्बत ही नहीं हैं, छलावा हैं...फिर चाहे वे जिंदगी भर मिले या ना मिले, इस बात से क्या फ़र्क पड़ता हैं !...वास्तव में उसी एक की खातिर बेलाग खुशियों का त्याग करके ताउम्र उसके इंतजार में जिंदगी तमाम ख़ाक कर ली जाती हैं...पर अन्यथा नहीं हुआ जाता !...जिसे हम बेतहाशा चाहते हैं वो अंशगत हो जाता हैं, हममें समाहित हो जाता हैं ! अंततः उसके ना लौटने अथवा उसको फिर कभी ना पाने की नाउम्मीदी में भी किसी और का नहीं हुआ जा सकता, तथापि जिंदगी तन्हाई में बिताकर ताउम्र प्यार की वफ़ा और शुचिता को अखण्ड रखा जाता हैं।                                             प्रेम अपने प्रियतम के प्...